
भारत, जिसे कृषि प्रधान राष्ट्र कहा जाता है, आज अपने अन्नदाताओं की करुण पुकार को अनसुना कर रहा है। खेतों में लहलहाती फसलें अब किसानों के चेहरों पर मुस्कान नहीं, बल्कि चिंता की लकीरें छोड़ रही हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्य में मात्र तीन महीनों में 767 किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाना इस पीड़ा का भयावह प्रमाण है।
🌱 असल जड़: लागत में उछाल, आय में गिरावट
खेती अब लाभ का साधन नहीं रही, बल्कि एक जोखिम भरा जुआ बन चुकी है।
- बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल—हर जरूरी चीज़ की कीमतें आसमान छू रही हैं।
- लेकिन फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या तो तय नहीं होता, या फिर किसानों तक पहुंच ही नहीं पाता।
- मौसम की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन और सिंचाई संसाधनों की कमी इस संकट को और गहरा करती हैं।
जब किसान सरकार से राहत की आस लगाते हैं, उन्हें जुमलों से संतोष करना पड़ता है, जबकि बड़े उद्योगपतियों के लिए हजारों करोड़ के ऋण बिना शर्त माफ कर दिए जाते हैं।
🗳️ राजनीतिक स्वर: विपक्ष की चेतावनी और सत्ता की चुप्पी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में इस भयावह स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर चिंता जताई। उन्होंने लिखा:
“767 किसान नहीं, 767 सपनों की अर्थियां। और सरकार? मौन की चादर ओढ़े बैठी है।”
उनका यह वक्तव्य न केवल सरकार की उदासीनता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र अब भी किसानों की बजाय सत्ता के प्रचार तंत्र पर है।
🌍 विदेशी निर्भरता: कृषि की आत्मनिर्भरता पर संकट
भारत अब कृषि के कई अहम पहलुओं—जैसे विशेष उर्वरक, कीटनाशक व बीज—के लिए चीन जैसे देशों पर निर्भर होता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, करीब 80% उर्वरक और रासायनिक घटक आयात किए जाते हैं।
यह न केवल देश की खाद्य सुरक्षा पर खतरा है, बल्कि “आत्मनिर्भर भारत” की परिकल्पना को भी चुनौती देता है।
✅ संभावित समाधान: सिर्फ नीतियाँ नहीं, नियत चाहिए
- सभी कृषि उत्पादों के लिए कानूनी रूप से सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू किया जाए।
- उर्वरक और बीजों के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन नीति बनाई जाए।
- किसानों के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी कर्ज राहत तंत्र विकसित किया जाए।
- ग्राम स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र खोले जाएं ताकि संकटग्रस्त किसान संवाद कर सकें।
- मंडी और फसल बिक्री प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए ताकि बिचौलियों का वर्चस्व खत्म हो।
📢 जनजागरण आवश्यक है
यह समस्या केवल सरकार और विपक्ष की बहस का विषय नहीं है—यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हमें किसानों के संघर्ष को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य समझकर आगे बढ़ना होगा।