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🌺 रंगोली बनी टीबी जागरूकता की आवाज़: पुदुचेरी में छात्रों की अभिनव पहल


भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा टीबी मुक्त भारत अभियान अब केवल स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी नहीं रहा, बल्कि समाज के हर वर्ग—खासकर युवाओं—की भागीदारी इसमें झलकने लगी है। इसी कड़ी में पुदुचेरी के विलियानुर पीएचसी नर्सिंग कॉलेज के छात्रों ने एक नई मिसाल पेश की है। उन्होंने रंगोली की पारंपरिक कला के माध्यम से टीबी के खिलाफ सशक्त जागरूकता संदेश दिया।

🎨 जब रंग बोले स्वास्थ्य की भाषा

भारतीय संस्कृति में रंगोली सिर्फ त्योहारों की शोभा नहीं होती, यह सामूहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। छात्रों ने इस कला को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा और रंगों के ज़रिए यह बताया कि टीबी कोई अभिशाप नहीं, बल्कि इलाज योग्य बीमारी है—जरूरत है केवल समय पर पहचान और इलाज की।

👉 उनके रंगोली डिज़ाइनों में शामिल थे:

👩‍⚕️ छात्रों का योगदान: स्वास्थ्य अभियान की रीढ़

इस पहल से यह स्पष्ट है कि नर्सिंग जैसे पेशों में अध्ययन कर रहे युवा भी समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। जब रचनात्मकता और सामाजिक चेतना का संगम होता है, तब वह केवल कला नहीं रहती—वह जन आंदोलन बन जाती है।

📱 सोशल मीडिया से मिली ताकत

इस रंगोली कार्यक्रम को स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी सराहा और सोशल मीडिया पर साझा किया। इससे अभियान को और अधिक जन समर्थन मिला। #TBMuktBharat, #EndTB जैसे हैशटैग्स अब सिर्फ डिजिटल प्रतीक नहीं, बल्कि जमीनी आंदोलनों के हिस्सेदार बन चुके हैं।

🔚 निष्कर्ष: बदलाव की बुनियाद में रंग और रचना

टीबी जैसी बीमारी से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं लड़ी जाती, वह गली-कूचों, स्कूलों और कला दीर्घाओं में भी लड़ी जाती है। रंगोली के माध्यम से दिया गया यह संदेश न सिर्फ आकर्षक है, बल्कि असरदार भी। और यही साबित करता है कि जब युवा रंग उठाते हैं, तो वह केवल सजावट नहीं, बल्कि समाज को रंगने का जरिया बन जाते हैं—जागरूकता से, उम्मीद से, और परिवर्तन से।


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