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🇮🇳 व्यापार नीति पर उठा सियासी तूफ़ान: राहुल गांधी की चुनौती और मोदी सरकार की प्रतिक्रिया


Anoop singh

भारत की विदेश व्यापार नीति एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार अमेरिका के दबाव में झुकने को तैयार है। यह बयान ऐसे समय पर आया है जब अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित टैरिफ दबाव की चर्चा फिर से तेज़ हो गई है।

🔍 मामले की जड़ क्या है?

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक व्यापारिक सम्मेलन में कहा था कि भारत कभी भी किसी भी व्यापार समझौते को बाहरी दबाव या समय सीमा के आधार पर नहीं अपनाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत केवल वही समझौते करता है, जो देशहित और परस्पर लाभ की कसौटी पर खरे उतरते हों।

इस पर पलटवार करते हुए राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी अंततः अमेरिकी टैरिफ की समयसीमा के सामने झुक जाएंगे, जिससे भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

🌐 नीति में सैद्धांतिकता या व्यावहारिक मजबूरी?

भारत सरकार का कहना है कि उसकी व्यापार नीति मजबूत, आत्मनिर्भर और सिद्धांतों पर आधारित है। फिलहाल भारत अमेरिका, यूरोपीय संघ, ओमान, चिली और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है।

लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार की बातें और कार्यों में अंतर है। राहुल गांधी की टिप्पणी इसी आशंका को रेखांकित करती है कि कहीं भारत वैश्विक ताकतों के सामने अपने सिद्धांतों से समझौता तो नहीं कर रहा?

🧭 राजनीति के अंदर छुपा रणनीतिक संदेश

राहुल गांधी का यह हमला केवल आर्थिक नीतियों पर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी है। यह मोदी सरकार की “आत्मनिर्भर भारत” की परिकल्पना और वैश्विक मंचों पर भारत की स्वायत्त छवि को चुनौती देने का प्रयास प्रतीत होता है।

सरकार की प्रतिक्रिया में इसे विपक्ष की “राजनीतिक नौटंकी” बताया गया है। सरकार का तर्क है कि भारत आज पहले से कहीं अधिक मजबूत और वैश्विक निर्णयों में प्रभावशाली बनकर उभरा है।

📝 निष्कर्ष: बहस केवल व्यापार की नहीं है

यह विवाद केवल व्यापार नीति तक सीमित नहीं है। यह भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति, कूटनीतिक स्वतंत्रता और वैश्विक पहचान से भी जुड़ा मसला है।

प्रश्न यह है:
क्या भारत वैश्विक दबावों के बीच अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और संप्रभुता की रक्षा कर पा रहा है?
या विपक्ष का डर जायज़ है कि देश की नीति धीरे-धीरे बाहरी शक्तियों के प्रभाव में ढल रही है?

यह सवाल आज हर सोचने वाले नागरिक के सामने खड़ा है।


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