भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर उठने वाले विवाद अब एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर लगाए गए आरोपों ने एक बार फिर ऑपरेशन ब्लू स्टार और उससे जुड़े निर्णयों की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुबे का दावा है कि यह हमला केवल भारत की आंतरिक नीति का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसमें ब्रिटेन की सैन्य सलाह भी शामिल थी।
⚔️ इतिहास पर लगा विदेशी प्रभाव का आरोप
दुबे ने ब्रिटिश दस्तावेजों का हवाला देते हुए यह दावा किया कि ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना में सलाहकार की भूमिका में शामिल थे। अगर यह सच है, तो यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक गठजोड़ का मामला बन जाता है। यह आरोप इंदिरा गांधी के नेतृत्व और उनकी नीतियों पर गहरे प्रश्नचिन्ह लगाता है।
🌊 करतारपुर और जल समझौते: एक व्यापक परिप्रेक्ष्य
दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि 1960 की सिंधु जल संधि और करतारपुर साहिब का पाकिस्तान को सौंपा जाना कांग्रेस की कमजोरी और लचर विदेश नीति का प्रमाण है। इस दावे से यह संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय हितों को धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व के स्थानों पर प्राथमिकता नहीं दी गई, जिससे देश के कई वर्गों में असंतोष गहराया।
🧑💼 1984 के बाद की राजनीति और सिख समुदाय
दुबे का यह भी कहना है कि 1984 के सिख दंगों के बाद कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर कुछ सिख नेताओं को ऊँचे पदों पर नियुक्त किया, जिससे असल दोषियों पर कार्यवाही टल गई। यह आरोप न केवल राजनीतिक प्रबंधन बल्कि न्यायिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा करता है।
🧠 गहराई से विश्लेषण: ऐतिहासिक घटनाओं का राजनीतिक दोहन
इतिहास को जब राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो वह न केवल सच को धुंधला करता है, बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव को भी खतरे में डालता है। ऑपरेशन ब्लू स्टार एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल मुद्दा रहा है, जिसे केवल एक दल या नेता के नजरिए से देखना अनुचित होगा। अगर ब्रिटेन की संलिप्तता की बात में दम है, तो यह मुद्दा केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय जांच का विषय बन सकता है।
🕊️ निष्कर्ष: सच्चाई की तलाश जरूरी, सियासी फायदे नहीं
आज जब पुराने ज़ख्म फिर कुरेदे जा रहे हैं, तो सवाल यह उठता है कि क्या यह बहस वास्तविक न्याय और पारदर्शिता की दिशा में है, या केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक हिस्सा? हमें इतिहास को टुकड़ों में नहीं, संपूर्णता में समझने की आवश्यकता है। तथ्यों की गहराई से जांच और निष्पक्ष विश्लेषण ही देश की एकता और लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है।
