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कांवड़ यात्रा और पहचान अभियान: आस्था की राह या उन्माद की दिशा?


भारत में सावन मास का विशेष महत्त्व है—यह न केवल भगवान शिव की आराधना का समय है, बल्कि कांवड़ यात्रा जैसी भव्य धार्मिक यात्राओं के ज़रिए जनमानस की श्रद्धा का विराट रूप भी सामने आता है। परंतु वर्ष 2025 की कांवड़ यात्रा से पहले “पहचान अभियान” के नाम पर जो घटनाएँ सामने आई हैं, वे एक सवाल उठाती हैं: क्या आस्था के रास्ते को असहिष्णुता की ओर मोड़ा जा रहा है?


🔍 पहचान अभियान: धार्मिक आस्था या सांप्रदायिक उकसावा?

मुज़फ्फरनगर से उठी आवाज़ों में सबसे स्पष्ट और सधी हुई आवाज़ रही राकेश टिकैत की। उन्होंने उन तत्वों की तीव्र आलोचना की, जो कांवड़ मार्ग पर धर्म के आधार पर दुकानों और लोगों की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं। हरिद्वार में एक मुस्लिम परिवार पर हमले की घटना इस अभियान की संवेदनहीन परिणति को दर्शाती है।

राकेश टिकैत का बयान बेहद स्पष्ट था:

“पहचान के नाम पर नफरत मत फैलाओ, रास्ता शांति का होना चाहिए।”

यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की पुकार थी।


रंगों में समाधान: पहचान नहीं, परस्पर सम्मान

टिकैत ने एक सार्थक समाधान भी प्रस्तुत किया—शाकाहारी प्रतिष्ठानों को हरे रंग से और मांसाहारी को लाल रंग से चिह्नित करने का सुझाव। महाराष्ट्र के नागपुर में यह प्रणाली सफल रही है और इससे टकराव टालने में मदद मिली है।

यह सुझाव केवल व्यावहारिक नहीं, बल्कि सहिष्णुता और परस्पर सम्मान की नींव पर खड़ा है। यह दिखाता है कि धार्मिक विविधता के बीच भी समरसता संभव है—यदि नीयत साफ हो।


🔊 ध्वनि, अनुशासन और संयम की भूली सीख

डिजे, तेज़ संगीत और उग्र प्रदर्शन आज कांवड़ यात्रा का एक दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं। BKU प्रमुख नरेश टिकैत की संयम की अपीलों को नज़रअंदाज़ कर देना इस ओर इशारा करता है कि अब धार्मिक उत्सवों में अनुशासन के बजाय उन्माद प्रबल होता जा रहा है।

राकेश टिकैत ने कटाक्ष करते हुए कहा:

“आज अगर कोई शांति की बात करे तो उसे गद्दार कहा जाता है।”

यह बयान हमारी सामाजिक चेतना को झकझोरने वाला है। क्या वाकई हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि सौहार्द्र की बात भी गुनाह लगने लगे?


⚠️ विगत से सबक, भविष्य के लिए चेतावनी

पिछले वर्ष की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक यात्राएँ यदि अनुशासन और समझदारी से न संचालित हों, तो वे विनाशकारी रूप भी ले सकती हैं। उत्सव का मतलब उन्माद नहीं होता—यह मूल बात कहीं खोती जा रही है।


✍️ निष्कर्ष: आस्था का सम्मान या समाज का विघटन?

कांवड़ यात्रा का उद्देश्य भगवान शिव तक जल पहुँचाना है—नफरत नहीं। यदि इसे पहचान, विभाजन या हिंसा के माध्यम में बदला गया, तो न केवल यात्रा की पवित्रता नष्ट होगी, बल्कि भारत की सामाजिक संरचना भी प्रभावित होगी।

राकेश टिकैत जैसे नेताओं की भूमिका आज अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—क्योंकि जब बहुमत चुप होता है, तब सच बोलना साहस बन जाता है।


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