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2020 दिल्ली दंगे: शिफा-उर-रहमान के खिलाफ साजिश का कोई सबूत नहीं – अदालत में सुनवाई

Anoop singh

7 जुलाई 2025, नई दिल्ली – कड़कड़डूमा अदालत में सोमवार को 2020 दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साजिश के मामले में आरोपी शिफा-उर-रहमान के खिलाफ आरोप तय करने को लेकर सुनवाई हुई। अदालत के समक्ष बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि शिफा-उर-रहमान के खिलाफ साजिश में शामिल होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

शिफा-उर-रहमान, जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं, उन कार्यकर्ताओं में शामिल हैं जिन पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम – UAPA के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा रहा है। पुलिस का आरोप है कि 2020 के दंगे एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे, जिसमें रहमान समेत कई लोगों की संलिप्तता बताई गई है।

पुलिस ने कहा कि रहमान जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी (JCC) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के व्हाट्सएप समूहों से जुड़े थे। हालांकि, बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि रहमान इन समूहों में सक्रिय सदस्य नहीं थे और किसी भी आपत्तिजनक गतिविधि में उनकी कोई भागीदारी नहीं पाई गई है।

सलमान खुर्शीद ने कहा कि रहमान ने किसी भी प्रदर्शनकारी को आर्थिक सहायता नहीं दी थी, और यदि उन्होंने ऐसा किया भी हो, जैसे कि प्रदर्शनकारियों के लिए खाना या बारिश से बचाव के लिए कवर की व्यवस्था की, तो इसे सामान्य मानवीय कार्य माना जाना चाहिए, न कि साजिश के रूप में।

उन्होंने आगे कहा कि साजिश साबित करने के लिए ‘मानसिक मिलन’ (meeting of minds) आवश्यक होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जो यह दर्शाए कि आरोपियों के बीच किसी प्रकार का ऐसा समन्वय था।

विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने दिल्ली पुलिस का पक्ष अदालत में रखा। अदालत ने निर्देश दिया कि पक्षकार लिखित दलीलें पेश करें और मामले की अगली सुनवाई 11 जुलाई को निर्धारित की है।

निष्कर्ष:
शिफा-उर-रहमान के खिलाफ अभी तक कोई ऐसा प्रमाण सामने नहीं आया है जो उन्हें 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश में प्रत्यक्ष रूप से जोड़ता हो। अदालत में पेश किए गए तर्कों से यह स्पष्ट होता है कि रहमान के खिलाफ लगाए गए आरोपों की कानूनी मजबूती पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। अब देखना होगा कि आगामी सुनवाई में अदालत किस निष्कर्ष पर पहुँचती है।


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