
भारत की आर्थिक संरचना में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (NBFCs) एक अहम भूमिका निभाती हैं, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिनकी पहुँच पारंपरिक बैंकों तक सीमित या अनुपलब्ध रहती है। हालाँकि, इन संस्थाओं की वसूली प्रक्रियाओं को लेकर हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने जो टिप्पणी की है, वह न केवल चेतावनी है, बल्कि एक संवेदनशील और नैतिक दृष्टिकोण की माँग भी करती है।
🔍 समस्या का स्वरूप: मानवीय गरिमा पर आघात
वित्त मंत्री ने सार्वजनिक रूप से इस चिंता को व्यक्त किया कि कुछ एनबीएफसी बेहद छोटे ऋण—जैसे ₹500 तक के—की वसूली के लिए भी कठोर और अमानवीय तरीके अपना रही हैं। इन तरीकों में मानसिक उत्पीड़न, सामाजिक अपमान और कभी-कभी शारीरिक हिंसा जैसी घटनाएँ भी शामिल हैं, जो न केवल कर्जदार की आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती हैं, बल्कि वित्तीय संस्थानों की नैतिकता पर भी सवाल उठाती हैं।
📜 नैतिक ऋण वसूली: फेयर प्रैक्टिस कोड का महत्व
सीतारमण ने स्पष्ट रूप से कहा कि सभी एनबीएफसी को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित “फेयर प्रैक्टिस कोड” का कठोरता से पालन करना चाहिए। इसमें ग्राहकों के साथ सम्मानजनक और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। ऋणदाता और ऋणग्राही के बीच का रिश्ता केवल वित्तीय नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा पर आधारित होना चाहिए।
💼 वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी और प्राथमिकता ऋण की पुनर्विचार
मंत्री ने यह सवाल भी उठाया कि प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending) के तहत हर वर्ष आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त क्यों रह जाता है? उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी निधियों का पुनः वितरण ऐसी एजेंसियों के ज़रिए होना चाहिए जो वास्तव में ज़रूरतमंद लाभार्थियों तक पहुँच बना सकें। यह व्यवस्था केवल बजट खपत का खेल नहीं, बल्कि समावेशी वित्त का माध्यम बननी चाहिए।
⚖️ विकास और संवेदना का संतुलन
वित्त मंत्री का यह वक्तव्य महज़ प्रशासनिक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय सोच को दर्शाता है। आर्थिक प्रगति तभी सार्थक है जब उसमें संवेदनशीलता और नैतिक मूल्य समाहित हों। जब कोई ग्राहक ऋणधारी के रूप में नहीं, बल्कि एक गरिमामयी नागरिक के रूप में देखा जाता है, तब ही वित्तीय समावेशन की अवधारणा साकार होती है।
🔚 निष्कर्ष: मानवीय वित्त की ओर एक कदम
यह वक्त है कि भारत की एनबीएफसी क्षेत्र आत्मनिरीक्षण करे और अपनी वसूली प्रक्रिया को गरिमामयी बनाए। यदि इस चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए और ग्राहक के साथ सम्मानजनक व्यवहार को मूलभूत नीति बनाया जाए, तो यह भारत की वित्तीय प्रणाली के लिए एक नई शुरुआत होगी — जहाँ लाभ के साथ-साथ लोकहित भी केंद्र में हो।
✨ प्रस्तावित स्लोगन (जनजागरण हेतु):
“ऋण वसूली में गरिमा हो शामिल, तभी बनेगा भारत आर्थिक रूप से स्थिर!”