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🌱 पर्यावरण संरक्षण और बनमहोत्सव: ममता बनर्जी का हरियाली की ओर आह्वान 🌱


Anoop singh

✨ प्रस्तावना

जुलाई का महीना भारत के लिए केवल वर्षा और हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की गूंज भी है। इसी पावन समय में बनमहोत्सव मनाया जाता है—एक ऐसा अभियान जो वृक्षारोपण से आगे बढ़कर जनजागरूकता, सामूहिक प्रयास और हरियाली के प्रति भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन चुका है। इस वर्ष, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने संदेश में इस पर्व को और भी गहराई से रेखांकित किया।


🍃 ममता बनर्जी का भावनात्मक संदेश

बनमहोत्सव के अवसर पर ममता बनर्जी ने ट्वीट कर एक मार्मिक और प्रेरणादायक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने लिखा:

“सबुज बांचाओ, सबुज देखाओ, सबुजेर माझे विवेक जागाओ”

इन शब्दों में केवल कविता नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति दार्शनिक विचार है—जहाँ हरियाली को केवल देखने या बचाने की चीज़ नहीं, बल्कि चेतना और विवेक का माध्यम बताया गया है। उनका यह आह्वान, आज के समय में पर्यावरणीय संकट से लड़ने की आवश्यकता को नई भावनात्मक शक्ति देता है।


🎶 “कथा ओ सुर”: संस्कृति और पर्यावरण का संगम

ममता बनर्जी द्वारा लिखित और रूपंकर बागची द्वारा स्वरबद्ध “कथा ओ सुर” नामक प्रस्तुति ने बनमहोत्सव को एक सांस्कृतिक ऊँचाई दी। यह वीडियो संगीत, कविता और पर्यावरणीय सोच का अनूठा संगम है—जो जनता के दिलों को छूता है और उन्हें हरियाली के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ता है।


🌳 बनमहोत्सव का सामाजिक और नैतिक महत्व

  1. पर्यावरणीय उत्तरदायित्व: पेड़ लगाना सिर्फ प्रकृति से जुड़ने का माध्यम नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वायु और जल का उपहार है।
  2. सांस्कृतिक चेतना: यह पर्व भारतीय जीवनशैली और प्रकृति पूजा की परंपरा को पुनर्स्थापित करता है।
  3. जन-सहभागिता की शक्ति: जब लोग मिलकर वृक्ष लगाते हैं, तो यह सामूहिक चेतना का प्रमाण बनता है, जो किसी भी पर्यावरणीय अभियान की आत्मा है।

🗣️ नागरिकों की प्रतिक्रियाएँ

एक बंगाली ट्विटर उपयोगकर्ता ने प्रतिक्रिया दी:

“গাছ লাগানো একটাই কাজ নয়—এটা ভবিষ্যতের অধিকারের প্রতীক।”
(वृक्ष लगाना एक काम नहीं, बल्कि आने वाले कल का अधिकार है।)

यह भावना दर्शाती है कि कैसे बनमहोत्सव केवल सरकार का प्रयास नहीं, बल्कि आम जनता की सोच का भी हिस्सा बन चुका है।


✅ निष्कर्ष: हरियाली के साथ जुड़ाव का एक नया अध्याय

ममता बनर्जी का यह हरित संदेश केवल भाषण नहीं, बल्कि एक नैतिक आग्रह है—जहाँ हर व्यक्ति को प्रकृति के रक्षक की भूमिका निभानी है। बनमहोत्सव, यदि केवल औपचारिकता न रहकर एक जनांदोलन बन जाए, तो भारत को एक स्वस्थ, हरित और संतुलित भविष्य की ओर बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।


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