
भारत की आत्मा उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में बसती है। यह विविधता केवल भाषाओं तक सीमित नहीं, बल्कि उससे जुड़ी पहचान, स्वाभिमान और राजनीतिक विमर्श को भी जन्म देती है। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा असम सरकार पर लगाए गए गंभीर आरोपों ने इन बहसों को एक बार फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है।
📢 ममता बनर्जी का दावा: बंगालियों को भेजे जा रहे नोटिस
कोलकाता में एक विशाल विरोध प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि असम सरकार कथित तौर पर बंगाली भाषी नागरिकों को नोटिस भेज रही है और उन्हें परेशान कर रही है। उनका आरोप है कि बंगाली भाषा बोलने के कारण लोगों को न केवल निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि उन्हें गिरफ्तारी और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके अपने परिवार के कुछ सदस्य भी इस प्रक्रिया में प्रभावित हुए हैं।
यह आरोप केवल किसी राज्य की नीतियों की आलोचना भर नहीं है—यह भारतीय संघीय व्यवस्था और भाषाई अधिकारों की बुनियाद को चुनौती देता है।
⚖️ क्या यह केवल राजनीति है या वाकई में खतरा?
यह सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी का यह रुख केवल राजनीतिक फायदे के लिए है, या वाकई में एक समुदाय को अपनी भाषाई पहचान के लिए प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। यदि उनके आरोपों में सच्चाई है, तो यह स्थिति चिंताजनक है और एक बड़े लोकतांत्रिक संकट का संकेत देती है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, जिसमें अपनी भाषा का प्रयोग भी शामिल है। ऐसे में किसी व्यक्ति को केवल उसकी मातृभाषा के आधार पर दंडित करना असंवैधानिक और अमानवीय है।
🗳️ वोटर लिस्ट विवाद: एक और चिंता
ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग और भाजपा मिलकर बंगाल में बंगाली मतदाताओं के नाम हटवा रहे हैं, और अन्य राज्यों के नागरिकों को यहाँ का मतदाता बना रहे हैं। अगर यह सत्य सिद्ध होता है, तो यह भारत की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मतदाता सूची में इस प्रकार का छेड़छाड़ न केवल असंवैधानिक है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
📌 अन्य राज्यों में बंगालियों की स्थिति
महाराष्ट्र और असम में बंगाली समुदाय के साथ हो रहे व्यवहार का ज़िक्र करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि इन राज्यों में भी भाषाई आधार पर भेदभाव हो रहा है। यह चिंता न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि भाषाई विविधता को यदि सम्मान न दिया जाए, तो वह समाज में विघटन का कारण बन सकती है।
✊ कोलकाता का जनसैलाब: अधिकारों की मांग
त्रणमूल कांग्रेस द्वारा आयोजित विरोध मार्च में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। यह प्रदर्शन केवल सरकार के विरोध का माध्यम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक आह्वान था—जिसमें भाषा, पहचान और नागरिक अधिकारों को लेकर आवाज उठाई गई।
🔍 निष्कर्ष: क्या भाषाई असहमति राष्ट्रीय एकता को चुनौती दे सकती है?
भारत में भाषाएँ सिर्फ संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक अस्तित्व का अहम हिस्सा हैं। यदि किसी समुदाय को उसकी भाषा के कारण नीचा दिखाया जाता है या प्रताड़ित किया जाता है, तो यह संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों दोनों का हनन है।
ममता बनर्जी के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाषाई अधिकारों की रक्षा केवल भाषाविदों या सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हर जागरूक नागरिक और प्रशासन की भी जवाबदेही है।
हमें यह तय करना होगा कि हम भाषा को राजनीति का हथियार बनाएंगे या विविधता का उत्सव। भारत की आत्मा “एकता में अनेकता” है, और भाषाई सम्मान उसी एकता का मूल स्तंभ है।