
नई दिल्ली, 17 जुलाई 2025:
भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले चुनाव आयोग की निष्पक्षता एक बार फिर कटघरे में है। इस बार आरोप सीधे कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से आए हैं, जिन्होंने बिहार में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग को भाजपा की “चुनाव चोरी शाखा” करार दिया है। यह एक गंभीर टिप्पणी है, जो न केवल राजनीतिक व्यवस्था बल्कि लोकतंत्र की साख पर भी सवाल खड़े करती है।
📹 आरोप का आधार: वायरल वीडियो और हस्ताक्षर घोटाला
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें कुछ सरकारी कर्मचारियों को मतदाता फार्म भरते और दस्तावेज़ों पर स्वयं ही हस्ताक्षर करते हुए दिखाया गया है। राहुल का दावा है कि यह सब बिना संबंधित मतदाताओं की जानकारी के किया गया, जो सीधा मतदाता अधिकारों का उल्लंघन है।
उन्होंने सवाल उठाया, “क्या चुनाव आयोग अब संविधान के तहत संचालित होने वाली एक स्वतंत्र संस्था है, या फिर भाजपा की चुनावी मशीनरी का हिस्सा बन चुका है?” उनके हैशटैग #वोटचोरी ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है।
🧾 SIR घोटाले की पुनरावृत्ति?
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाए हों। इससे पहले भी, उन्होंने बिहार में ही SIR (Special Identity Replacement) नामक योजना के नाम पर मतदाता डेटा में छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। उस समय भी उन्होंने वीडियो और तथ्यों के साथ अपना पक्ष सामने रखा था। उनका कहना है कि जब आम नागरिक इन धांधलियों को उजागर करते हैं, तब उनके खिलाफ ही प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर दी जाती है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और संवैधानिक विमर्श
गौर करने वाली बात यह भी है कि ठीक कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदाता पहचान के लिए आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे वैकल्पिक दस्तावेजों के प्रयोग की अनुमति देते हुए विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाने की हरी झंडी दी थी। इस संदर्भ में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अजीत बग्गी की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को पारदर्शिता बरतने का निर्देश भी दिया था।
🔍 निष्पक्षता पर सवाल: जनविश्वास की कसौटी
राहुल गांधी के इन आरोपों से यह सवाल फिर उभर आया है कि क्या चुनाव आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन सही रूप से कर रहा है? यदि एक प्रमुख विपक्षी नेता चुनावी प्रक्रिया को ही अविश्वसनीय बताता है, तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।
चुनाव आयोग की ओर से अब तक इस पूरे प्रकरण पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन यह स्पष्ट है कि यदि इस तरह के आरोप सार्वजनिक रूप से और साक्ष्य सहित लगाए जाते हैं, तो आयोग को न केवल स्पष्टीकरण देना होगा, बल्कि ठोस कार्यवाही कर जनविश्वास भी बहाल करना होगा।
✍️ निष्कर्ष:
चुनाव केवल मतपत्रों और मशीनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जनता के भरोसे और संस्थाओं की साख पर आधारित होते हैं। अगर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहेंगे और वे अनुत्तरित रहेंगे, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगेंगी। अब समय आ गया है कि आयोग पारदर्शिता की दिशा में ठोस कदम उठाए और यह सिद्ध करे कि वह किसी भी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और जनता के अधिकारों का रक्षक है।