
केरल की एक महिला जेल से शेरिन करानावर की समय से पहले रिहाई ने राज्य की आपराधिक न्याय प्रणाली और दंड सुधार नीति को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 2009 में अपने ससुर की हत्या के मामले में दोषी पाई गई शेरिन को 2010 में उम्रकैद की सजा मिली थी, लेकिन अब 14 वर्षों के बाद, राज्य सरकार के निर्णय के चलते उन्हें रिहा कर दिया गया है।
🔎 हत्या का मामला: एक क्रूर सच्चाई
यह अपराध केवल घरेलू हिंसा नहीं, बल्कि एक साजिशनुमा हत्या थी जिसमें शेरिन ने अपने तीन सहयोगियों — बासित अली, नितिन और शानू राशीद — के साथ मिलकर अपने ससुर भास्कर करानावर की जान ली। इस गंभीर अपराध में उन्हें फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने दोषी करार दिया, और बाद में केरल उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा को सही ठहराया।
🔓 समयपूर्व रिहाई: नीति या पक्षपात?
राज्य सरकार ने जनवरी 2025 में ‘अच्छे व्यवहार’ का हवाला देते हुए शेरिन की रिहाई की सिफारिश की। हालांकि जेल रिकॉर्ड बताते हैं कि शेरिन के खिलाफ कई अनुशासनहीन घटनाएं दर्ज थीं, जिनमें फरवरी 2025 में एक अन्य महिला बंदी पर हमला भी शामिल है। इसके बावजूद, उन्हें उन 11 कैदियों में रखा गया जिन्हें समयपूर्व स्वतंत्रता मिली।
❓ असमंजस में समाज: यह न्याय या राजनीति?
इस निर्णय ने कई सवालों को जन्म दिया है:
- क्या इतनी गंभीर सजा केवल 14 साल में खत्म हो सकती है?
- जेल में अनुशासन के उल्लंघन के बावजूद रिहाई को किस आधार पर उचित ठहराया गया?
- क्या यह फैसला न्यायिक समीक्षा पर आधारित था, या राजनीतिक मान्यताओं से प्रेरित?
⚖️ सुधारात्मक दृष्टिकोण की सीमाएँ
भारत की जेल प्रणाली में अपराधियों के पुनर्वास पर ज़ोर दिया जाता है, लेकिन जब हिंसक अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों को समय से पहले रिहा किया जाता है, तो यह पीड़ित पक्ष के लिए न्याय के प्रति अविश्वास को जन्म देता है। सुधार और दंड के बीच संतुलन बनाए रखना नीतिगत रूप से आवश्यक है, लेकिन उसकी नींव न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही होनी चाहिए।
निष्कर्ष:
शेरिन करानावर की रिहाई केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक विमर्श का विषय बन चुकी है। क्या इस निर्णय से सुधार की अवधारणा मज़बूत होगी या न्याय की भावना कमजोर? इस पर अब जनता, न्यायविद और नीति-निर्माताओं को गंभीर विचार करना होगा।