
प्रस्तावना
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में कुषाण वंश का एक विशिष्ट स्थान है, और इस वंश के सबसे प्रभावशाली सम्राट माने जाते हैं महान कनिष्क। उनका शासनकाल न केवल सैन्य विस्तार और राजनीतिक एकीकरण का प्रतीक था, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण और धार्मिक समरसता का भी स्वर्णिम युग था।
🗺️ कनिष्क का साम्राज्य: एक विशाल भू-भाग का शासक
कनिष्क का साम्राज्य अपने समय का एक महाशक्ति था। यह साम्राज्य मध्य एशिया के बुखारा और समरकंद से शुरू होकर काबुल, गांधार, पंजाब, कश्मीर, उत्तर भारत के गंगा-यमुना के दोआब तक फैला हुआ था। पाटलिपुत्र से मथुरा और उज्जैन तक उनकी सत्ता की गूंज थी।
उनकी राजधानी प्रारंभ में पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) थी, जिसे बाद में उन्होंने मथुरा में स्थानांतरित किया। मथुरा उनके शासनकाल में कला, संस्कृति और बौद्ध धर्म का केंद्र बना।
🕊️ बौद्ध धर्म में कनिष्क का योगदान
कनिष्क को बौद्ध धर्म का महान संरक्षक माना जाता है। उन्होंने चतुर्थ बौद्ध संगीति (Council) का आयोजन कश्मीर में किया, जहाँ बौद्ध ग्रंथों का संकलन और संरक्षण हुआ। इस संगीति में महायान बौद्ध धर्म को औपचारिक रूप से मान्यता मिली।
उनके संरक्षण में बौद्ध धर्म चीन, मध्य एशिया और तिब्बत तक फैला। उन्होंने बौद्ध विहारों, स्तूपों और विश्वविद्यालयों का निर्माण कराया। उनके काल में गांधार शैली की बौद्ध मूर्तिकला ने अद्वितीय उन्नति पाई।
🏛️ कनिष्क और कला
कनिष्क के शासनकाल में गांधार और मथुरा कला का अभूतपूर्व विकास हुआ। पहली बार बुद्ध की मानव आकृति में मूर्तियाँ बनाई गईं, जिनमें यूनानी प्रभाव भी दिखाई देता है। कनिष्क की खुद की कांस्य मूर्ति भी खुदाई में मिली है, जो उनकी शक्ति और वैभव का प्रतीक है।
🧾 कनिष्क की मुद्रा और प्रशासन
कनिष्क ने स्वर्ण मुद्राएं जारी कीं जिनमें यूनानी और ईरानी देवताओं के साथ-साथ बौद्ध और हिंदू देवी-देवताओं की छवियां अंकित थीं। इससे उनकी धार्मिक सहिष्णुता और बहुधर्मी दृष्टिकोण का पता चलता है।
प्रशासनिक रूप से, उनका साम्राज्य एक सुदृढ़ और संगठित प्रणाली पर आधारित था। उन्होंने व्यापार को प्रोत्साहित किया और सिल्क रूट को पुनर्जीवित किया जिससे पूर्व और पश्चिम के देशों के बीच संपर्क और वाणिज्य को गति मिली।
🌍 अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
कनिष्क का काल वैश्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने चीन, रोमन साम्राज्य, ईरान और एशियाई क्षेत्रों के साथ संबंध बनाए। उनका नाम भारत के साथ-साथ एशियाई इतिहास में भी सम्मानपूर्वक लिया जाता है।
निष्कर्ष
कनिष्क केवल एक विजेता नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी प्रशासक, महान संरक्षक और धार्मिक सहिष्णु सम्राट थे। उनके शासनकाल में भारत सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हुआ। उनकी उपलब्धियां आज भी भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज हैं।