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📰 असम में भाषा विवाद पर ममता बनर्जी का तीखा प्रहार: “बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति चरम पर”



प्रस्तावना

भारत विविधताओं का देश है — यहाँ भाषाएं, संस्कृतियां और धर्म मिलकर एक समृद्ध समाज की रचना करते हैं। लेकिन जब राजनीति इन विविधताओं को विभाजन का माध्यम बना ले, तो सामाजिक सौहार्द पर संकट मंडराने लगता है। ऐसा ही एक मुद्दा हाल ही में तब सामने आया जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असम में हो रहे भाषा विवाद को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर सीधा हमला बोला।


भाषाई पहचान पर हमला: ममता बनर्जी का आरोप

19 जुलाई 2025 को एक बयान में ममता बनर्जी ने असम में बंगाली भाषी नागरिकों पर हो रहे कथित उत्पीड़न की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे भाजपा का “विभाजनकारी एजेंडा” बताया और कहा कि यह संविधान और देश की एकता के खिलाफ है।

ममता ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कहा,
“बंगला देश की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, और असम में भी यह दूसरी सबसे प्रमुख भाषा है। ऐसे में अगर कोई अपने मातृभाषा की पहचान की बात करता है, तो उसे धमकाना पूरी तरह असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है।”


भाषा और संस्कृति की रक्षा के समर्थन में

ममता बनर्जी ने कहा कि वे उन सभी नागरिकों के साथ खड़ी हैं जो अपने भाषा और सांस्कृतिक पहचान के लिए लड़ रहे हैं।
“मैं हर उस निर्भीक व्यक्ति के साथ हूं जो अपने भाषा, संस्कृति और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है,” उन्होंने कहा।


एनआरसी और बंगाली प्रवासियों पर संकट

इससे पहले, तृणमूल कांग्रेस से जुड़े ट्रेड यूनियन INTTUC (इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस) ने एनआरसी के विरोध में सिलीगुड़ी में एक विरोध मार्च निकाला। इसमें आरोप लगाया गया कि भाजपा शासित राज्यों में बंगाली भाषी प्रवासियों को अवैध नागरिक बताकर टारगेट किया जा रहा है और उन्हें हिरासत शिविरों में भेजा जा रहा है।

INTTUC के नेता नीरजल डे ने कहा:
“बंगालियों ने देश के लिए बलिदान दिए हैं, लेकिन आज उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि वे बंगाली बोलते हैं, उन्हें विदेशी करार दिया जा रहा है।”

उन्होंने ओडिशा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 400 बंगालियों को हिरासत शिविरों में भेजा गया है, जबकि उनका अपराध केवल इतना है कि वे बंगाली भाषा बोलते हैं।


राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले ने देश में भाषा आधारित भेदभाव की गंभीरता को फिर से उजागर कर दिया है। जहां एक ओर ममता बनर्जी इसे “संवैधानिक संकट” कह रही हैं, वहीं भाजपा की ओर से अब तक इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन यह साफ है कि भाषा और पहचान को लेकर राजनीतिक टकराव अब और तीव्र होता जा रहा है।


निष्कर्ष

भाषा किसी की पहचान का मूल हिस्सा होती है, और उसे दबाना या डराना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है। असम में बंगाली भाषी नागरिकों के साथ हो रहा व्यवहार एक गंभीर मुद्दा बन चुका है, जिस पर केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ईमानदार राष्ट्रीय चर्चा और समाधान की आवश्यकता है। ममता बनर्जी की आवाज इस बहस को गति जरूर दे सकती है, लेकिन असली चुनौती भारत की एकता को बरकरार रखने की है — जहां हर भाषा, हर संस्कृति को बराबर सम्मान मिले।


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