
इस्लामाबाद, जुलाई 2025:
पाकिस्तान एक बार फिर प्रकृति के रौद्र रूप का शिकार बना है। देश के विभिन्न हिस्सों में आई मानसूनी बारिश और उससे उत्पन्न बाढ़ ने न सिर्फ जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि देश की जलवायु तैयारी और अवसंरचनात्मक मजबूती पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस त्रासदी में अब तक 200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें करीब 100 मासूम बच्चे भी शामिल हैं।
📍 सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र
सबसे ज़्यादा जानलेवा असर पंजाब प्रांत में देखा गया, जहाँ अकेले 123 मौतें दर्ज की गई हैं। इसके अतिरिक्त:
- खैबर पख्तूनख्वा: 40 मौतें
- सिंध: 21
- बलूचिस्तान: 16
- इस्लामाबाद और पीओके: 1-1 मौत
मुख्य कारणों में घरों का ढहना, बिजली का करंट लगना, तेज बहाव में बह जाना, और बिजली गिरना शामिल हैं।
🧒 बच्चों पर कहर और मानव संकट
अब तक 560 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें 182 बच्चे हैं। स्कूलों और अस्पतालों तक पहुँच बाधित हो चुकी है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर गंभीर असर पड़ा है।
🌊 शहरों में तबाही: Rawalpindi और Faisalabad
रावलपिंडी में जलस्तर इतना बढ़ गया कि लोगों को घरों की छतों पर शरण लेनी पड़ी। फैसलाबाद में सिर्फ दो दिनों में 11 मौतें और 60 घायल दर्ज किए गए। अधिकांश घटनाएँ कमजोर इमारतों के गिरने से हुईं, जोकि बुनियादी ढांचे की अस्थिरता को दर्शाता है।
🏚️ अवसंरचना की बर्बादी
चकवाल ज़िले में रिकॉर्ड 450 मिमी से अधिक बारिश हुई, जिससे 32 सड़कें पूरी तरह बह गईं। दर्जनों गांव बाहरी दुनिया से कट चुके हैं। बिजली और संचार सेवाएँ अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं।
❄️ ग्लेशियर झीलों से बढ़ता खतरा
संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में स्थित ग्लेशियर झीलें कभी भी फट सकती हैं। इससे आने वाले हफ्तों में और ज़्यादा विनाशकारी बाढ़ की आशंका जताई जा रही है।
🌍 जलवायु परिवर्तन: चेतावनी से वर्तमान संकट तक
2022 की बाढ़ से पाकिस्तान को पहले ही 1,700 से अधिक जानें, लाखों विस्थापन और लगभग 40 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति झेलनी पड़ी थी। 2025 की यह आपदा उस त्रासदी की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का डर नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह सच्चाई बन चुका है।
🔚 निष्कर्ष: चेतना और तैयारी की पुकार
अब समय आ गया है कि पाकिस्तान और वैश्विक समुदाय जलवायु परिवर्तन को सिर्फ पर्यावरणीय विषय न मानकर, इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता, और जनजीवन की रक्षा से जोड़कर देखें।
स्थायी समाधान, जलवायु अनुकूलन नीतियाँ, मजबूत आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र और टिकाऊ अवसंरचना — यही भविष्य के संकटों को रोकने की दिशा में निर्णायक कदम होंगे।