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🗳️ बिहार में रोजगार की जंग: राजनीति में नया मोड़, युवाओं की आवाज़ बनी प्राथमिकता


पटना, बिहार (20 जुलाई 2025):
बिहार की राजनीति, जो दशकों से जातीय समीकरणों और धार्मिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है, अब युवाओं की रोज़गार मांगों के साथ एक नया मोड़ लेती नज़र आ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में दिए गए तीखे बयान ने इस मुद्दे को और अधिक मुखर बना दिया है। उन्होंने कहा, “बिहार का युवा अब भाषणों से नहीं, भविष्य से उम्मीद करता है। उसे नौकरी चाहिए, नारे नहीं।”

📣 राजनीतिक संवाद में आया बदलाव
राहुल गांधी ने पटना में आयोजित युवा कांग्रेस के ‘महा रोजगार मेला’ के तुरंत बाद राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने बिहार को “बेरोजगारी का मैदान” बना दिया है। उनके अनुसार, लाखों शिक्षित युवाओं को रोजगार के लिए अपने घरों को छोड़कर अन्य राज्यों की ओर पलायन करना पड़ रहा है—यह एक सामाजिक और आर्थिक आपातकाल है।

राहुल गांधी ने INDIA गठबंधन की नीतियों की बात करते हुए यह भी जोड़ा कि:

🏛️ सरकार का जवाब और वादों की बौछार
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहुल गांधी की आलोचना का जवाब देते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों को सामने रखा। उन्होंने हाल ही में 430 नई योजनाओं को हरी झंडी दी है, जिन पर ₹50,000 करोड़ से अधिक खर्च होने की संभावना है। इसके तहत:

🧑‍🎓 युवाओं की भूमिका और युवा कांग्रेस की सक्रियता
युवा कांग्रेस द्वारा आयोजित ‘महा रोजगार मेला’ में हजारों युवाओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि बेरोजगारी अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि जन-संवेग का विषय बन चुका है। युवाओं की उपस्थिति ने यह संकेत दे दिया कि अगला चुनाव भाषणों से नहीं, नौकरी और नौकरशाही की जवाबदेही से तय होगा।


🔍 निष्कर्ष:
बिहार का राजनीतिक परिदृश्य अब भाषणबाज़ी से आगे बढ़ते हुए रोजगार की वास्तविक ज़रूरतों की ओर मुड़ रहा है। युवा मतदाता अब जागरूक है—वह अवसर चाहता है, आंकड़े नहीं; वह भागीदारी चाहता है, खोखले वादे नहीं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनावों में रोजगार की राजनीति किस हद तक सत्ता के समीकरणों को बदलती है।


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