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जलती असमानता: एशिया और प्रशांत क्षेत्र में गर्मी की लहरें महिलाओं को क्यों करती हैं सबसे ज़्यादा प्रभावित

प्रस्तावना
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन क्षेत्रों में हर साल तेज़ होती गर्मी की लहरें केवल स्वास्थ्य संकट नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर रही हैं—विशेषकर महिलाओं के लिए। यह एक “जलती असमानता” है, जहां प्रकृति का कहर लैंगिक असमानता से और अधिक भयावह बन जाता है।


गर्मी की लहरों का लैंगिक प्रभाव
गर्मी की लहरों से पुरुष और महिलाएं समान रूप से झुलसते प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक असंतुलित है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, महिलाएं—विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण, प्रवासी और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं—गर्मी की लहरों के दौरान अधिक जोखिम में होती हैं।

क्यों महिलाएं अधिक प्रभावित होती हैं?

  1. घरेलू और देखभाल का काम
    गर्मी के समय भी महिलाओं को रसोई में खाना पकाने, पानी लाने, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसे काम करने होते हैं। अक्सर यह काम बिना पंखे या वेंटिलेशन के गर्म, बंद जगहों में होता है, जिससे हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
  2. सार्वजनिक सेवाओं की असमान पहुंच
    महिलाओं को अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं, कूलिंग सेंटर्स और सूचना प्रणाली तक कम पहुंच होती है। सामाजिक मानदंडों के कारण वे सार्वजनिक स्थानों पर मदद लेने से कतराती हैं, जिससे आपात स्थिति में उनके लिए राहत मुश्किल हो जाती है।
  3. अनौपचारिक क्षेत्र में श्रम
    कई महिलाएं खेतों, सड़कों पर काम करती हैं या घरेलू कामगार होती हैं। ऐसे कार्यों में उन्हें लंबी धूप में रहना पड़ता है, जहां उनके पास छाया, ठंडा पानी या आराम करने की व्यवस्था नहीं होती।
  4. जल संकट की मार
    गर्मी की लहरों से जल स्रोत सूख जाते हैं, और पानी लाने की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर ही होती है। दूर-दूर से भारी बर्तनों में पानी लाना न केवल थका देने वाला होता है, बल्कि यह गर्मी में जानलेवा भी बन सकता है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव
महिलाओं में पोषण की कमी, एनीमिया और हार्मोनल परिवर्तन जैसे मुद्दे पहले से मौजूद रहते हैं। जब इन पर गर्मी का बोझ जुड़ता है, तो हृदय रोग, थकावट और गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं बढ़ जाती हैं।


जलवायु न्याय की मांग
गर्मी की लहरें केवल पर्यावरणीय संकट नहीं हैं, ये सामाजिक न्याय का मुद्दा भी हैं। यदि जलवायु नीतियों में लैंगिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, तो यह असमानता और बढ़ेगी। नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी, सुरक्षित कार्यस्थल, स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता और सार्वजनिक कूलिंग सिस्टम उनकी रक्षा के लिए अनिवार्य हैं।


निष्कर्ष
एशिया और प्रशांत क्षेत्र की महिलाएं जलवायु परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हैं—न केवल पीड़िता के रूप में, बल्कि समाधान की वाहक भी। लेकिन जब तक उनके अनुभवों, ज़रूरतों और अधिकारों को नीति और योजना में केंद्रीय स्थान नहीं दिया जाएगा, तब तक यह “जलती असमानता” बढ़ती ही रहेगी। अब वक्त है कि हम सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि सामाजिक तापमान को भी ठंडा करें।


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