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रैपुरा गुंता बांध मुख्य नहर में पानी की आपूर्ति बाधित: किसानों की फसलें सूखने की कगार परजिला चित्रकूट में बढ़ती प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल

चित्रकूट, 23 जुलाई 2025
रैपुरा गुंता बांध से जुड़ी मुख्य नहर में पानी की आपूर्ति को लेकर इस समय क्षेत्र के किसान भारी संकट का सामना कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि नहर में पानी आगे नहीं पहुंच रहा है, जिससे उनकी फसलें सूख रही हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

स्थानीय किसानों ने यह भी आरोप लगाया है कि सिंचाई विभाग के जिम्मेदार कर्मचारी जानबूझकर लापरवाही कर रहे हैं। उनका कहना है कि जून और जुलाई के महत्वपूर्ण सिंचाई काल में नहर का सारा पानी सिर्फ मुख्य मार्ग तक सीमित रह गया है, जबकि आगे के इलाकों तक पानी पहुंच ही नहीं पा रहा है।

जांच की मांग और लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई की गुहार
किसानों ने बताया कि जब उन्होंने इस समस्या को लेकर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो सिंचाई विभाग के एक प्रमुख अधिकारी हिमांशु शुक्ला [जे0ई0] ने उनका नंबर तक ब्लॉक कर दिया। इससे किसानों में और भी रोष है । उनका कहना है कि जो अधिकारी किसानों की समस्या तक सुनने को तैयार नहीं और किसानों ने जातिवाद फैलाने का भी आरोप लगाया ।

फसलें सूख रही हैं, किसान बेहाल

ग्रामीण क्षेत्रों में धान, उड़द, तिल, और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी है। लेकिन समय पर पानी न मिलने के कारण खेत सूखने लगे हैं और फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। एक किसान ने हिट एंड हाॅट न्यूज़ बताया, “हमने कर्ज लेकर बीज डाला था, लेकिन अब अगर पानी नहीं मिला तो पूरी मेहनत बर्बाद हो जाएगी।”

प्रशासनिक चुप्पी और किसानों की नाराजगी
इस पूरे मामले पर अभी तक जिला प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब-तक नहर की मरम्मत और नियमित जलापूर्ति की व्यवस्था नहीं की जाती, तब-तक वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

मांगें स्पष्ट: मरम्मत, जांच और जवाबदेही
किसानों की प्रमुख मांगें हैं:

  1. मुख्य नहर की तत्काल जांच कराई जाए।
  2. बंद पड़ी नहरों और शाखाओं की मरम्मत कराई जाए।
  3. लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
  4. प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाए।

निष्कर्ष:
रैपुरा गुंता बांध की यह समस्या केवल जलापूर्ति की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का भी प्रतीक बन चुकी है। अगर समय रहते जिम्मेदार अधिकारी और प्रशासन नहीं जागा, तो इसका प्रभाव सिर्फ फसलों पर नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी पड़ेगा।

किसानों की आवाज़ को दबाने की बजाय, उसे सुना जाए – क्योंकि अन्नदाता ही राष्ट्र की रीढ़ हैं।


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