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प्रकृति की क्रेडिट सीमा खत्म: अर्थ ओवरशूट डे की खामोश चेतावनी


24 जुलाई 2025 — आज मानवता के लिए आत्ममंथन का दिन है। यही वह तारीख है जब हमने इस वर्ष के लिए पृथ्वी द्वारा प्रदान किए जा सकने वाले प्राकृतिक संसाधनों की वार्षिक पूंजी को पहले ही खर्च कर दिया है। इस दिन को “अर्थ ओवरशूट डे” कहा जाता है — एक ऐसा संकेतक जो बताता है कि इंसानी ज़रूरतों ने प्रकृति की पुनर्निर्माण क्षमता को पीछे छोड़ दिया है।

🌍 क्या है अर्थ ओवरशूट डे?

“अर्थ ओवरशूट डे” एक पर्यावरणीय अवधारणा है, जिसे ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क नामक संगठन तय करता है। यह दिन प्रतीकात्मक रूप से उस बिंदु को दर्शाता है जब इंसानों द्वारा उपभोग किए गए संसाधनों की मात्रा, पृथ्वी द्वारा पूरे वर्ष में पुनः उत्पन्न की जा सकने वाली संसाधनों से अधिक हो जाती है।

दूसरे शब्दों में, यह दर्शाता है कि हम एक पृथ्वी की जगह 1.7 पृथ्वियों की जरूरत महसूस कर रहे हैं — जो न केवल असंभव है, बल्कि दीर्घकालीन विनाशकारी भी।


🔥 तेज़ी से आगे बढ़ रहा ओवरशूट

हर साल यह दिन पहले आता जा रहा है। 1970 के दशक में यह वर्ष के अंत के करीब आता था, लेकिन अब जुलाई तक खिसक आया है। इसका मतलब है कि हम संसाधनों का उपभोग तेज़ रफ्तार से कर रहे हैं और उसे पुनः भरने का मौका प्रकृति को नहीं दे रहे।

कारणों में शामिल हैं:


🌱 परिणाम: प्रकृति का जवाब

यह सब मिलकर एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर रहा है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए असुरक्षित और अनिश्चित है।


🛠️ क्या है समाधान?

“ओवरशूट” को उलटने के लिए हमें अपने उपभोग के पैटर्न में आमूलचूल बदलाव लाना होगा:

साथ ही, नीति-निर्माताओं, उद्योगों और आम जनता को साझा जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि हम “ओवरशूट” से “सस्टेनेबिलिटी” की ओर बढ़ सकें।


🔚 अंत में…

“अर्थ ओवरशूट डे” सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि पृथ्वी का संकट संकेत है — यह हमें बताता है कि हमें अब सोच बदलनी है, जीवनशैली बदलनी है और पृथ्वी के साथ सहयोग करना है, न कि उसका शोषण।

इस साल यह दिन फिर पहले आया है। अगली बार हम इसे देर से मनाएं, या बेहतर होगा ऐसा दिन ही न आए


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