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1991 का उदारीकरण बजट: भारत के आर्थिक पुनरुत्थान की नींव, मोदी सरकार की नीतियों को खड़गे ने बताया ‘विनाशकारी’


प्रकाशित तिथि: 24 जुलाई, 2025 | नई दिल्ली

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गुरुवार को 1991 के ऐतिहासिक ‘उदारीकरण बजट’ को भारत के आर्थिक इतिहास का निर्णायक मोड़ करार दिया। उन्होंने कहा कि 24 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शुरू की गई आर्थिक नीतियों ने देश के मध्य वर्ग को मजबूत करने और करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई।

खड़गे ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा,

“पी.वी. नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह के मार्गदर्शन में देश ने आर्थिक सुधारों की एक नई यात्रा शुरू की, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसरों का मार्ग प्रशस्त किया। कांग्रेस को इस बात पर गर्व है कि उसकी नीतियों ने भारत की समावेशी वृद्धि और सामाजिक उत्थान की नींव रखी।”

दूसरी पीढ़ी के सुधारों की ज़रूरत

खड़गे ने मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भारत एक बार फिर एक अहम मोड़ पर खड़ा है, जहाँ “प्रभावशाली और दूरगामी दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों” की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था ठहराव की स्थिति में है और गरीब, युवा, और मध्यम वर्ग आज गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।

“हमारी अर्थव्यवस्था मंद गति से बढ़ रही है, नौकरियाँ नहीं हैं, युवाओं का भविष्य अधर में है, और सामाजिक असमानता चरम पर है। बचत घट रही हैं और व्यापार युद्ध से कृषि व उद्योग दोनों प्रभावित हो रहे हैं,” खड़गे ने लिखा।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला

कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों को “विनाशकारी” बताते हुए कहा कि मौजूदा शासन “विजन और एक्शन दोनों में विफल” रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकता आम लोगों की भलाई नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों का लाभ है।

“आज की नीतियाँ न केवल गरीबों को पीछे छोड़ रही हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था को एक गहरे संकट की ओर धकेल रही हैं,” उन्होंने आरोप लगाया।

एलपीजी नीति की ऐतिहासिक भूमिका

24 जुलाई 1991 को डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तुत बजट को भारत के आर्थिक इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम माना जाता है। इस बजट के तहत एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) नीति की शुरुआत हुई, जिसने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई पहचान दी।

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की जोड़ी ने इस कठिन दौर में साहसिक निर्णय लिए, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने आर्थिक संकट से बाहर निकलकर एक स्थिर और तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया।


निष्कर्ष

1991 का बजट केवल एक वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता और विकास की आधारशिला था। कांग्रेस इस उपलब्धि को अपनी ऐतिहासिक नीति-दृष्टि का परिणाम मानती है, जबकि आज के राजनीतिक परिदृश्य में यह बहस का विषय बन गया है कि क्या मौजूदा नीतियाँ भी उतनी ही प्रभावशाली और दूरदर्शी हैं?


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