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चीन को यूरोप का सख्त संदेश: ‘बराबरी का व्यापार चाहिए, एहसान नहीं’ — वॉन डेर लेयेन


प्रकाशन तिथि: 24 जुलाई 2025

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने चीन के साथ व्यापारिक समीकरणों पर एक तीखा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि चीन यूरोपीय उद्योगों को समान अवसर नहीं देता, तो व्यापारिक द्वार लंबे समय तक खुले नहीं रह सकते।

ब्रुसेल्स में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “यूरोप समावेशी बाजारों में विश्वास रखता है, लेकिन व्यापार का अर्थ कभी भी एकतरफा लाभ नहीं हो सकता। पारदर्शिता और समान शर्तें ही टिकाऊ साझेदारी का आधार होती हैं।”

व्यापार में असंतुलन: यूरोप की बढ़ती बेचैनी

वर्तमान परिदृश्य में यूरोपीय संघ और चीन के बीच का व्यापारिक घाटा गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। यूरोपीय संघ का आरोप है कि चीन अपने उत्पादों की लागत कृत्रिम रूप से कम रखने के लिए भारी सरकारी सब्सिडी दे रहा है और विदेशी कंपनियों के लिए नियामक अवरोध पैदा कर रहा है।

नतीजा: यूरोपीय कंपनियां चीन में संघर्ष कर रही हैं, जबकि सस्ते चीनी उत्पाद यूरोपीय बाजारों में बाढ़ की तरह घुस आए हैं — जिससे स्थानीय उद्योगों पर संकट गहरा गया है।

“यह सिर्फ व्यापार नहीं, यूरोप की संप्रभुता का सवाल है”

वॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट किया कि यह केवल आर्थिक असंतुलन नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी है। उन्होंने कहा,
“जब कोई देश खुले बाज़ार का लाभ उठाता है लेकिन खुद अपने दरवाज़े बंद रखता है, तो यह साझेदारी नहीं, शोषण बन जाती है।”

क्या होंगे यूरोपीय कदम?

यूरोपीय संघ पहले ही चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों, हरित ऊर्जा उपकरणों और स्टील आयातों पर कड़े जांच-पड़ताल की प्रक्रिया में है। सूत्रों के मुताबिक, यदि चीन अपने व्यापारिक रवैये में शीघ्र बदलाव नहीं लाता, तो यूरोपीय आयोग अतिरिक्त टैरिफ, प्रवेश सीमाएं, या प्रतिबंधात्मक कोटा प्रणाली लागू कर सकता है।

चीन की प्रतिक्रिया?

चीनी पक्ष ने सार्वजनिक रूप से अब तक संयमित बयान दिए हैं, लेकिन अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि बीजिंग इन चेतावनियों को कूटनीतिक दबाव मानकर चल रहा है। हालांकि, यूरोपीय नीति-निर्माताओं का कहना है कि यह दबाव नहीं, बल्कि न्यायसंगत वैश्विक व्यापार का आग्रह है।


निष्कर्ष:
वॉन डेर लेयेन के बयान से यह स्पष्ट संकेत गया है कि यूरोपीय संघ अब नीतिगत ढिलाई नहीं बरतेगा। ‘खुला व्यापार’ अब बराबरी और पारदर्शिता के मूल्यों से जुड़ा रहेगा — और यदि कोई देश इन सिद्धांतों को नज़रअंदाज़ करता है, तो उसे यूरोपीय द्वार पर दस्तक देने से पहले कई बार सोचना होगा।


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