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🛑 अवैध ई-फार्मेसियों पर एआईओसीडी की सख्त मांग: एसएलए की निष्क्रियता पर उठाए सवाल


नई दिल्ली, जुलाई 2025 — भारत की फार्मेसी व्यवस्था को सुचारु रखने के उद्देश्य से सक्रिय ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) ने एक बार फिर अवैध ऑनलाइन फार्मेसियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। संगठन ने देशभर में संचालित हो रहीं गैर-लाइसेंसी ई-फार्मेसियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए राज्य स्तर की लाइसेंसिंग अथॉरिटीज़ (SLAs) की निष्क्रियता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

📢 एआईओसीडी का आरोप: स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

एआईओसीडी का कहना है कि अवैध ई-फार्मेसियां न केवल फार्मेसी कानूनों का उल्लंघन कर रही हैं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य से भी खिलवाड़ कर रही हैं। इन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से नशीली दवाओं, एंटीबायोटिक्स और नियंत्रित दवाओं की होम डिलीवरी बिना वैध डॉक्टर की पर्ची के हो रही है। यह न सिर्फ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 का सीधा उल्लंघन है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकता है।

🏛️ एसएलए की चुप्पी पर सवाल

एआईओसीडी ने आरोप लगाया कि राज्यों की लाइसेंसिंग अथॉरिटीज़ (SLAs) इन अवैध गतिविधियों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा रहीं। संगठन का कहना है कि इन अधिकारियों की निष्क्रियता के चलते ही अवैध फार्मेसियों को बढ़ावा मिल रहा है। कई राज्यों में तो यह ऑनलाइन फार्मेसियां बिना किसी पंजीकरण के खुलेआम कारोबार कर रही हैं।

⚖️ कानूनी कदम और केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग

एआईओसीडी ने स्वास्थ्य मंत्रालय से मांग की है कि वह सभी अवैध ई-फार्मेसियों को तत्काल बंद करने के लिए एक केंद्रीय तंत्र विकसित करे और संबंधित राज्यों पर दबाव बनाए। संगठन ने यह भी सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो, तो इन अवैध प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ सीबीआई या ईडी जैसी जांच एजेंसियों से जांच कराई जाए।

🔍 उपभोक्ता भ्रम और मूल्य नियंत्रण की अनदेखी

संगठन का यह भी कहना है कि इन ई-फार्मेसियों द्वारा उपभोक्ताओं को भारी छूट का झांसा देकर बाज़ार को असंतुलित किया जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय मेडिकल स्टोर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि दवाओं की गुणवत्ता और मूल्य नियंत्रण भी संदिग्ध हो गया है। कई बार ग्राहकों को एक्सपायर्ड या सब-स्टैंडर्ड दवाएं भी दी जाती हैं।


✅ निष्कर्ष

अवैध ई-फार्मेसियों पर एआईओसीडी की सख्त मांग भारत में दवा वितरण व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी को उजागर करती है। जब तक राज्य और केंद्र सरकार इस विषय पर कठोर और समन्वित कार्रवाई नहीं करते, तब तक जनता की सेहत खतरे में बनी रहेगी। पारंपरिक मेडिकल स्टोर्स की सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और दवा कानूनों का पूर्ण पालन अब समय की सबसे बड़ी मांग है।


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