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🛤️ एशिया-प्रशांत में बुनियादी ढांचे की असमानता: संतुलित विकास की ओर एक नई राह


28 जुलाई 2025

एशिया-प्रशांत क्षेत्र वर्तमान में विकास की उस दहलीज़ पर खड़ा है जहाँ प्रगति के चमकते संकेत तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उसके पीछे छुपी गहराई से जुड़ी असमानताएँ भी उतनी ही चिंताजनक हैं। एक ओर महानगरों में स्मार्ट सिटी, मेट्रो ट्रेन, हाईस्पीड इंटरनेट और अत्याधुनिक सड़क नेटवर्क की गूंज है, तो दूसरी ओर लाखों लोग ऐसे भी हैं जो पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से अब भी वंचित हैं।

📊 तेजी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण का दबाव

बीते दशकों में एशिया-प्रशांत देशों ने तेज़ी से आर्थिक तरक्की की है, लेकिन इस तरक्की का बड़ा हिस्सा शहरी केंद्रों तक सीमित रहा। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की विकास गति अब भी धीमी है। बढ़ती जनसंख्या और शहरी विस्तार के कारण शहरों पर जबरदस्त दबाव बना हुआ है—परिणामस्वरूप ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, झुग्गी बस्तियों का फैलाव और सार्वजनिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं।

🏞️ ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों की उपेक्षा

अनेक पहाड़ी, द्वीपीय और सीमावर्ती क्षेत्रों में आज भी सड़कों की पहुँच नहीं है, अस्पताल और स्कूलों की संख्या नाममात्र है, और डिजिटल कनेक्टिविटी न के बराबर है। इन इलाकों में रहने वाले लोगों की विकास से दूरी न सिर्फ सामाजिक असमानता को जन्म देती है, बल्कि क्षेत्रीय अस्थिरता और पलायन जैसी समस्याओं को भी जन्म देती है।

🏗️ समावेशी और टिकाऊ बुनियादी ढांचे की आवश्यकता

अब समय आ गया है कि विकास की दिशा को केवल “बड़े शहरों की चकाचौंध” से हटाकर “हर गाँव, हर घर” तक पहुँचाया जाए। इसके लिए सरकारों, निजी कंपनियों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मिलकर एक दीर्घकालिक और समावेशी रणनीति बनानी होगी, जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर ज़ोर दिया जाए:

🌏 निष्कर्ष: आगे का रास्ता

यदि एशिया-प्रशांत को सही मायनों में 21वीं सदी की आर्थिक शक्ति बनना है, तो उसे शहरी और ग्रामीण विकास के बीच की खाई को कम करना ही होगा। केवल मेट्रो शहरों का विकास ही पर्याप्त नहीं है; ज़रूरी है कि वह समग्र विकास हो, जिसमें हर व्यक्ति को समान अवसर, संसाधन और सुविधा मिले। तभी यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर एक समावेशी, संतुलित और सतत विकास की मिसाल बन सकेगा।


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