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भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs): अर्थव्यवस्था में नया उभरता इंजन


परिचय:
भारत तेजी से वैश्विक व्यापारिक मानचित्र पर एक अहम केंद्र बनता जा रहा है, खासकर ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के क्षेत्र में। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक ये केंद्र भारत की GDP में 2 प्रतिशत का योगदान देंगे और लगभग 2.8 मिलियन (28 लाख) नौकरियों का सृजन करेंगे। यह न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को गति देगा, बल्कि देश को वैश्विक नेतृत्व में अग्रणी भी बनाएगा।

GCCs क्या हैं?
GCCs जिन्हें पहले Global In-house Centers (GICs) या Captive Centers के रूप में जाना जाता था, वे ऐसी इकाइयाँ होती हैं जो वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत जैसे टैलेंट-समृद्ध देशों में स्थापित की जाती हैं। इनका उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएं, नवाचार और बौद्धिक संपदा निर्माण करना होता है।

तेजी से हो रहा विस्तार:
2023-24 में भारत में 1700 से अधिक GCCs सक्रिय थे और अनुमान है कि यह संख्या 2030 तक 2200 से ऊपर पहुँच जाएगी। यह इंगित करता है कि भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए एक प्रमुख पसंदीदा स्थान बन गया है।

GCCs का आर्थिक प्रभाव:

अग्रणी शहर:
भारत के टियर-1 शहरों में GCCs का प्रसार सबसे अधिक है:

सफलता के पीछे कारण:
भारत में GCCs के विकास को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारक हैं:

निष्कर्ष:
GCCs ने अब केवल लागत-कटौती केंद्रों से आगे बढ़कर खुद को नवाचार, दक्षता और वैश्विक नेतृत्व का स्तंभ बना लिया है। भारत ने इस अवसर को पहचाना है और उसे मजबूती से अपनाया है। आने वाले वर्षों में, GCCs भारत के आर्थिक विकास में न केवल योगदान देंगे, बल्कि देश को विश्व व्यापार में अग्रणी बनाएंगे।


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