
प्रस्तावना
भारत की विदेश नीति दशकों से विविधताओं और परिवर्तनशील परिस्थितियों के बीच आकार लेती रही है। परंतु हाल के वर्षों में एक बार फिर कांग्रेस की विदेश नीति को कठघरे में खड़ा किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई आलोचना ने इस विषय को सार्वजनिक बहस का केंद्र बना दिया है, विशेष रूप से इंदुस जल संधि जैसे समझौतों की पृष्ठभूमि में।
🕊️ ऐतिहासिक समझौतों पर दृष्टि
- इंदुस जल संधि (1960): यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच एक जल-विभाजन समझौता थी जिसे पं. जवाहरलाल नेहरू और अयूब खान ने विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित किया। आलोचक इसे भारत के हितों के विरुद्ध मानते हैं क्योंकि भारत को अपनी नदियों के सीमित उपयोग की अनुमति मिली।
- चीन और पाकिस्तान के साथ कूटनीति: कांग्रेस शासनकाल में कई बार ऐसे निर्णय लिए गए जिन्हें राष्ट्रहित से समझौता मानकर आलोचना की गई, जैसे कि चीन के साथ 1962 की युद्ध पश्चात सीमाओं पर रुख।
📌 वर्तमान राजनीतिक टिप्पणियां
हाल के संसदीय सत्र में इस विषय पर तीव्र बहस देखी गई। मोदी ने कहा, “कांग्रेस की विदेश नीति हमेशा दोषपूर्ण रही है और इसके कई उदाहरण हैं।” यह वक्तव्य उन निर्णयों की ओर संकेत करता है जिन्हें वर्तमान सरकार राष्ट्रहित के विपरीत मानती है।
🌍 जनमत और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर देशवासियों ने इस विषय पर तीव्र प्रतिक्रिया दी। एक उत्तरदाता ने ट्वीट किया, “#IndusWaterTreaty इतनी पाक-समर्थक थी कि भारत को नदी तल की सफाई तक करने की अनुमति नहीं दी गई।” यह जनभावना बताती है कि जनता अब अपने इतिहास की नीतिगत परतों को समझना चाहती है।
🔍 निष्कर्ष
देश की विदेश नीति का मूल्यांकन सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि राष्ट्र की दीर्घकालिक सुरक्षा और विकास के आधार पर होना चाहिए। कांग्रेस की विदेश नीति ने कुछ ऐतिहासिक समझौते किए, परन्तु उनका प्रभाव वर्तमान समय में प्रश्नचिह्न बन गया है। यह आवश्यक है कि नीति-निर्माण में पारदर्शिता, जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।