नई दिल्ली, 2 अगस्त 2025:
‘जॉब के बदले ज़मीन’ घोटाले को लेकर दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई तेज हो गई है। इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के खिलाफ दलीलों का दौर जारी है। बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि यह मामला पहले ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा जांचा जा चुका है और उस समय इसे बंद करने की रिपोर्ट पटना कोर्ट में दाखिल की गई थी।
🔍 पुराने मामले की नई पड़ताल
सीबीआई की ओर से पूर्व में इस मामले में की गई जांच को आधार बनाते हुए लालू परिवार के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि यह दोबारा उसी विषय पर जांच की कोशिश है जिसे पहले ही निपटाया जा चुका है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वर्ष 2007-08 में जो ज़मीन खरीदी गई, उसका नौकरी से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
🏢 ए.के. इन्फोसिस्टम्स का बचाव
मामले में शामिल कंपनी ए.के. इन्फोसिस्टम्स प्रा. लि. की तरफ से पेश वकीलों ने अदालत में कहा कि यदि कंपनी ने किसी से ज़मीन खरीदी, तो यह महज एक व्यावसायिक सौदा था। उनका तर्क था कि जिस व्यक्ति से ज़मीन खरीदी गई थी, उसे एक साल बाद रेलवे में नौकरी मिली, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि ज़मीन के बदले नौकरी दी गई।
💰 संपत्ति, देनदारी और आरोप
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि ए.के. इन्फोसिस्टम्स की संपत्ति ₹1.77 करोड़ की है, लेकिन उसमें लालू यादव के परिवार की हिस्सेदारी मात्र ₹1 लाख की है। इसके बावजूद कंपनी पर ₹1.20 करोड़ की देनदारी दर्शाई गई है। ईडी का आरोप है कि यह एक तरह की परदे के पीछे की डीलिंग है, जो मनी लॉन्ड्रिंग के अंतर्गत आ सकती है।
⚖️ अदालत का अगला कदम
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय कर दी है। फिलहाल, कोर्ट यह तय करेगी कि आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलेगा या नहीं। बचाव पक्ष द्वारा क्लोज़र रिपोर्ट और समय अंतराल के आधार पर राहत की मांग की जा रही है, जबकि ईडी और सीबीआई की दलीलों में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप प्रमुख हैं।
📌 निष्कर्ष:
‘जॉब के बदले ज़मीन’ मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनता जा रहा है। जहां एक ओर लालू यादव और उनके परिवार के वकील इसे पुराना और निष्पादित मामला बता रहे हैं, वहीं ईडी और सीबीआई इसे सत्ता के दुरुपयोग का गंभीर मामला मान रहे हैं। अब देखना यह है कि अदालत इस विवाद को किस दिशा में ले जाती है।
