
जब भी कोई प्राकृतिक या मानवजनित आपदा आती है, तो उसका प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ता है। लेकिन इसका सबसे गहरा असर उन लोगों पर होता है जो पहले से ही सामाजिक, शारीरिक या आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में होते हैं—विशेष रूप से दिव्यांगजन। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction – DRR) की हर रणनीति समावेशी हो और दिव्यांगजनों की भागीदारी को अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करे।
इसी दिशा में एक सशक्त पहल करते हुए संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) ने Disability-Inclusive Disaster Risk Reduction (DiDRR) पर आधारित एक ऑनलाइन फ्री कोर्स की शुरुआत की है, जो सभी के लिए सुलभ है।
🎓 DiDRR कोर्स की झलक
1️⃣ ऑनलाइन और स्व-गति से सीखने योग्य
यह कोर्स किसी भी समय और कहीं से भी किया जा सकता है, जो छात्रों, पेशेवरों और नीति-निर्माताओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।
2️⃣ चार प्रमुख मॉड्यूल
इसमें समावेशन के सिद्धांतों से लेकर नीति निर्माण, व्यवहारिक अध्ययन और केस स्टडी तक की विस्तृत जानकारी दी गई है।
3️⃣ प्रमाण-पत्र आधारित प्रशिक्षण
कोर्स पूरा करने पर प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है, जो उनके करियर में एक अतिरिक्त योग्यता के रूप में काम आ सकता है।
🌐 दिव्यांग समावेशन क्यों ज़रूरी है?
विश्व स्तर पर अनुमानित एक अरब से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। फिर भी, आपदाओं के दौरान इनके लिए न चेतावनी प्रणाली होती है, न सुरक्षित शरणस्थल और न ही बहाल होने की पर्याप्त योजना।
DiDRR पहल इस असमानता को समाप्त करने का प्रयास करती है, ताकि आपदा से पहले, दौरान और बाद में भी दिव्यांगजन को बराबरी का अवसर और सुरक्षा मिल सके।
🌀 सेन्डाई फ्रेमवर्क के लक्ष्य की ओर
Sendai Framework for Disaster Risk Reduction (2015-2030) का मुख्य उद्देश्य है कि आपदाओं से होने वाली हानि को कम किया जाए और उसमें “No One Left Behind” यानी “किसी को पीछे न छोड़ा जाए” की भावना को प्राथमिकता दी जाए। DiDRR कोर्स इसी वैश्विक उद्देश्य को जमीनी स्तर पर साकार करता है।
📢 निष्कर्ष: सबके लिए सुरक्षित भविष्य
आपदाएं भले ही अंधाधुंध आती हों, लेकिन उनका असर हर किसी पर अलग-अलग होता है। यदि हम वास्तव में एक सशक्त, संवेदनशील और समावेशी समाज की कल्पना करते हैं, तो हमें DiDRR जैसे उपायों को न केवल अपनाना होगा, बल्कि उसे व्यवहार में उतारना भी होगा। यह न केवल दिव्यांगजनों की सुरक्षा की गारंटी है, बल्कि मानवीय गरिमा और समानता की दिशा में एक निर्णायक कदम भी।