
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, ऐसे समय में प्लास्टिक प्रदूषण एक ऐसी चुनौती बनकर उभरी है, जो हर देश को प्रभावित कर रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हाल ही में एक ट्वीट में इस विषय पर वैश्विक प्रयासों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि विभिन्न देश एक वैश्विक #PlasticsTreaty (प्लास्टिक संधि) पर चर्चा कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य #BeatPlasticPollution यानी प्लास्टिक प्रदूषण को हराना है।
🌿 प्लास्टिक संकट: समस्या कितनी गंभीर है?
प्लास्टिक का उत्पादन और उपयोग लगातार बढ़ रहा है। हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक समुद्रों, नदियों और ज़मीनों में फेंका जाता है, जिससे जैव विविधता, मानव स्वास्थ्य और जलवायु पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। प्लास्टिक न केवल एक बार प्रयोग की जाने वाली वस्तु बन गई है, बल्कि यह पेट्रोलियम आधारित होने के कारण जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को भी बढ़ाती है।
🌐 क्यों ज़रूरी है एक वैश्विक समझौता?
स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर की गई कोशिशें तब तक सीमित ही रहती हैं जब तक कि उन्हें वैश्विक रूप से समन्वित नहीं किया जाए। प्लास्टिक प्रदूषण सीमाएं नहीं जानता — यह हवा, पानी और वैश्विक व्यापार के जरिए हर कोने में पहुंच जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए, एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि की जरूरत है जो प्लास्टिक के पूरे जीवन-चक्र को नियंत्रित करे — उत्पादन से लेकर निपटान तक।
🏛️ ICJ की सलाह और न्यायिक भूमिका
गुटेरेस ने यह भी उल्लेख किया कि इस संधि को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की हालिया जलवायु परिवर्तन पर दी गई परामर्शात्मक राय को भी ध्यान में रखना चाहिए। ICJ ने यह स्पष्ट किया है कि देशों की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाएं।
इस राय के अनुसार, फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) से हटकर स्थायी ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ना अनिवार्य है, और प्लास्टिक उद्योग पर नियंत्रण उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।
🔄 आगे का रास्ता: निष्पक्षता और पारदर्शिता
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह संधि न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रभावी होनी चाहिए। इसमें विकसित और विकासशील दोनों देशों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाए, ताकि कोई भी देश पीछे न छूटे।
📢 निष्कर्ष
ग्लोबल प्लास्टिक संधि न केवल एक पर्यावरणीय समझौता है, बल्कि यह हमारी पृथ्वी की रक्षा के लिए एक नैतिक जिम्मेदारी भी है। इस पहल के जरिए हम एक ऐसा भविष्य गढ़ सकते हैं जहाँ नदियाँ, महासागर और धरती प्लास्टिक मुक्त हो, और अगली पीढ़ियाँ एक स्वच्छ वातावरण में साँस ले सकें।