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🗳️ बिहार चुनाव 2025: अखिल भारतीय जन संघ ने समान प्रतीक चिन्ह की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया


नई दिल्ली, 5 अगस्त 2025 — बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मियाँ तेज हो रही हैं, और इसी बीच एक अहम कानूनी पहलू ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। अखिल भारतीय जन संघ (ABJS) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिसमें एक समान चुनाव प्रतीक चिन्ह की मांग की गई है। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग से जवाब माँगा है।

🏛️ अदालती सुनवाई और आयोग से जवाब की मांग

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा की एकल पीठ ने इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग (ECI) को आदेश दिया है कि वह 19 अगस्त 2025 तक अपना लिखित उत्तर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। याचिका में यह उल्लेख किया गया है कि ABJS ने 2 जून को चुनाव आयोग को पत्र भेजा था, जिसमें बिहार चुनावों के लिए एक निश्चित प्रतीक चिन्ह दिए जाने का अनुरोध किया गया था। जवाब न मिलने पर, 4 जुलाई को एक अनुस्मारक भेजा गया, जिसका भी कोई उत्तर नहीं प्राप्त हुआ।

🏛️ ABJS की पृष्ठभूमि और कानूनी स्थिति

अखिल भारतीय जन संघ एक पंजीकृत लेकिन अप्रत्याक्षित राजनीतिक दल है, जिसकी वैचारिक नींव 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित भारतीय जन संघ में जुड़ी मानी जाती है। वर्ष 1979 में इस दल ने वर्तमान नाम अपनाया और 1989 में इसे चुनाव आयोग में आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया। संगठन द्वारा हर दो वर्षों में आंतरिक चुनाव कराए जाते हैं, और यह विभिन्न राज्यों में सक्रिय रूप से चुनाव लड़ता रहा है।

🎵 प्रतीक चिन्ह की मांग: पूर्व की मिसाल और तर्क

2024 में आयोजित आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में ABJS को ‘सितार’ प्रतीक चिन्ह आवंटित किया गया था, जो इसके सक्रिय चुनावी भागीदारी को रेखांकित करता है। पार्टी का कहना है कि उसकी संगठित उपस्थिति और लगातार चुनाव लड़ने का इतिहास उसे एक समान चिन्ह प्राप्त करने का कानूनी और नैतिक आधार देता है। प्रतीक चिन्ह के अभाव में मतदाता भ्रमित हो सकते हैं, जिससे चुनाव में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।

⚖️ चुनाव चिन्ह और लोकतांत्रिक अधिकार

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि चुनाव चिन्ह का न मिलना पार्टी के उम्मीदवारों की पहचान और प्रचार को प्रभावित करता है। एक स्थायी प्रतीक चिन्ह से न केवल पार्टी की पहचान मजबूत होती है, बल्कि यह मतदाताओं तक उसकी विश्वसनीयता भी दर्शाता है — विशेषकर जब चुनाव क्षेत्रीय स्तर पर हो रहा हो।


📌 निष्कर्ष

ABJS की यह कानूनी पहल सिर्फ उसकी पहचान की मांग नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया में समानता और पारदर्शिता की मांग भी है। यदि कोर्ट इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है, तो यह निर्णय भविष्य में अन्य छोटे या अप्रत्याक्षित दलों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। अब सभी की निगाहें 19 अगस्त की सुनवाई और चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।


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