
पटना/नई दिल्ली, 6 अगस्त – भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा 1 अगस्त से शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान बिहार की मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशन के बाद एक अभूतपूर्व स्थिति देखने को मिली है — राजनीतिक दलों की ओर से किसी भी प्रकार की आपत्ति या दावा दर्ज नहीं किया गया है।
राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी: क्यों खामोश हैं दावेदार?
सामान्यतः जब मतदाता सूचियों का प्रारूप सार्वजनिक किया जाता है, तब राजनीतिक दल सक्रिय रूप से अपने बूथ लेवल एजेंट (BLA) के माध्यम से सूचियों की समीक्षा करते हैं। उनका उद्देश्य होता है यह सुनिश्चित करना कि समर्थकों के नाम सूची में मौजूद हों और विरोधियों के नाम संदिग्ध न हों।
लेकिन इस बार, चुनाव आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह दर्ज है कि भाजपा (BJP), कांग्रेस (INC), आप (AAP), और राजद (RJD) जैसे किसी भी प्रमुख दल ने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी है। उनके कॉलम में ‘0’ दर्ज है – जो न केवल असामान्य है बल्कि चिंताजनक भी।
आम नागरिकों की सक्रियता
राजनीतिक दलों की इस निष्क्रियता के विपरीत, आम मतदाताओं ने अपनी जागरूकता का परिचय दिया है। आयोग के अनुसार, 3,657 व्यक्तिगत दावे और आपत्तियां मतदाताओं द्वारा दर्ज की गई हैं। साथ ही, 18 वर्ष से अधिक आयु के नवयुवाओं द्वारा 19,186 नए पंजीकरण फॉर्म जमा किए गए हैं, जो युवा वर्ग की लोकतंत्र में बढ़ती रुचि और सक्रियता को दर्शाता है।
SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की पारदर्शिता
SIR अभियान का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और सटीक बनाना है, ताकि कोई भी मतदाता वंचित न रह जाए या किसी का नाम अनधिकृत रूप से सूची में न हो। आयोग के नियमों के अनुसार, सभी प्राप्त आपत्तियों और दावों का निपटान 7 दिनों के भीतर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) द्वारा किया जाना अनिवार्य है।
साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित प्रारूप सूची से किसी भी नाम को हटाने से पहले उचित सुनवाई की जाएगी। इससे मतदाता अधिकारों की रक्षा होती है और प्रक्रिया की निष्पक्षता बनी रहती है।
संभावित कारण और आगे की राह
इस पूरे परिदृश्य से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं:
- क्या राजनीतिक दल अपने BLA नेटवर्क को सक्रिय रखने में असफल हो रहे हैं?
- या फिर मतदाता सूची पहले से इतनी त्रुटिरहित है कि हस्तक्षेप की आवश्यकता ही नहीं पड़ी?
- क्या यह राजनीतिक उदासीनता एक नई लोकतांत्रिक दिशा का संकेत है जहाँ आम मतदाता स्वयं प्रक्रिया में भागीदारी निभा रहा है?
यह निष्क्रियता भविष्य के चुनावों में राजनीतिक दलों की रणनीति और भरोसे को प्रभावित कर सकती है। वहीं, बिहार की जनता की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र अब केवल नेताओं की नहीं, बल्कि नागरिकों की भी जिम्मेदारी बन चुकी है।
निष्कर्ष
बिहार में मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक चुप्पी और आम लोगों की सक्रियता एक नई लोकतांत्रिक चेतना को जन्म देती है। यह स्थिति पूरे देश के लिए प्रेरणादायक हो सकती है, जहाँ नागरिकों की भागीदारी, राजनीतिक नेतृत्व की निष्क्रियता पर भारी पड़ती दिखाई देती है। आने वाले समय में, यही जागरूक नागरिक लोकतंत्र के सच्चे रक्षक बनेंगे।
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