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लखीमपुर खीरी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की निष्क्रियता पर जताई सख्त नाराजगी


नई दिल्ली, 7 अगस्त 2025 — लखीमपुर खीरी हिंसा मामला एक बार फिर सुर्खियों में है, और इस बार वजह है उत्तर प्रदेश पुलिस की निष्क्रियता, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त टिप्पणी की है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक अहम गवाह की सुरक्षा और शिकायत पर लापरवाही को लेकर राज्य पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

गवाह को मिली धमकी, पुलिस रही चुप

मामले में मुख्य गवाह बलजिंदर सिंह ने यह दावा किया कि उन्हें गवाही न देने के लिए धमकाया जा रहा है। उन्होंने इस संबंध में पुलिस को जानकारी भी दी थी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवहार को न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक बताया।

कोर्ट का सवाल: जब गवाह को बुलाया गया, तो सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?

कोर्ट ने विशेष रूप से पुलिस अधीक्षक (एसपी) की भूमिका पर सवाल उठाया। जब एसपी ने स्वयं गवाह को बुलाया, तो फिर पुलिस ने धमकी की शिकायत पर सक्रियता क्यों नहीं दिखाई? अदालत ने कहा कि यह दर्शाता है कि राज्य की एजेंसियां अब भी इस संवेदनशील मामले में निष्पक्षता से काम नहीं कर रही हैं।

सरकार की दलीलें अदालत को रास नहीं आईं

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह दलील दी कि गवाह पहले ही न्यायालय के समक्ष पेश हो चुका है, लेकिन उसने अपनी पहचान उजागर नहीं की। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि गवाह की झिझक खुद इस बात का संकेत है कि उसे अब भी अपनी सुरक्षा और पुलिस की नीयत पर भरोसा नहीं है।

एसपी को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एसपी बलजिंदर सिंह की वर्तमान स्थिति और सुरक्षा की पुष्टि करते हुए एक विस्तृत हलफनामा अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। कोर्ट ने साफ किया कि गवाहों की सुरक्षा और स्वतंत्रता किसी भी न्यायिक प्रक्रिया की बुनियाद होती है, और इसमें कोई कोताही नहीं होनी चाहिए।

दैनिक सुनवाई की मांग पर विचार नहीं, लेकिन प्रक्रिया तेज करने के निर्देश

पीड़ितों की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने मांग की थी कि मामले की रोजाना सुनवाई हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सहमति नहीं दी। हालांकि, अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि गवाहों की गवाही जल्द से जल्द पूरी की जाए। अगली सुनवाई की तारीख 20 अगस्त निर्धारित की गई है।

आशीष मिश्रा को मिली थी अंतरिम जमानत, फिर बढ़ी आलोचना

पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा, जिन पर किसानों को गाड़ी से कुचलने का आरोप है, उन्हें 25 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से आठ हफ्ते की अंतरिम जमानत मिली थी। बाद में यह अवधि बढ़ा दी गई। कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा था कि मिश्रा को अपने निवास स्थान की जानकारी अधिकारियों को देना अनिवार्य होगा।


न्याय की राह में रोड़े, लेकिन उम्मीद अभी बाकी है

लखीमपुर खीरी कांड न केवल एक क्रूर हिंसा की कहानी है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता और निष्पक्षता की कसौटी भी बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी यह दिखाती है कि संस्थाएं अब भी पीड़ितों की आवाज सुनने को तैयार हैं, भले ही राज्य की मशीनरी अपनी भूमिका ठीक से निभाने में असफल रही हो। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाली सुनवाइयों में यह मामला न्याय के करीब पहुंचेगा, और गवाहों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।


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