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🌾 भारत में उर्वरकों का महत्व: कृषि विकास और आत्मनिर्भरता की रीढ़


भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ खेत-खलिहान सिर्फ अन्न उत्पादन का स्रोत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं। ऐसे में उर्वरकों की भूमिका केवल फसल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की आत्मनिर्भरता से सीधे तौर पर जुड़ी है। हरित क्रांति के बाद से उर्वरकों ने भारतीय कृषि को नई दिशा दी, जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ।

🚜 हरित क्रांति से आत्मनिर्भरता तक का सफर
1960 के दशक में जब भारत गंभीर खाद्यान्न संकट का सामना कर रहा था, तब वैज्ञानिक तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाले बीज, आधुनिक सिंचाई प्रणालियों और उर्वरकों के संतुलित उपयोग ने कृषि क्षेत्र में क्रांति ला दी। इस बदलाव ने न केवल किसानों की उपज बढ़ाई, बल्कि उन्हें आधुनिक खेती की ओर प्रेरित किया।

📊 वर्ष 2023–24 में उर्वरक खपत की स्थिति

इन आँकड़ों से साफ है कि भारत अब अधिकांश प्रमुख उर्वरकों में आत्मनिर्भरता की दहलीज़ पर है, जो एक रणनीतिक उपलब्धि है।

🌱 उर्वरकों का व्यापक प्रभाव

🔍 भविष्य की दिशा: टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प
रासायनिक उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इनके अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की सेहत और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। इसलिए अब जरूरत है जैविक, बायो-फर्टिलाइज़र और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देने की, ताकि कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके।


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