
भारत का राष्ट्रीय ध्वज—तिरंगा—केवल तीन रंगों का संयोजन भर नहीं है, बल्कि यह हमारी आज़ादी की लड़ाई, बलिदानों और राष्ट्रीय एकता की अमर गाथा का प्रतीक है। जब यह हवा में लहराता है, तो हर भारतीय के हृदय में देशभक्ति का एक नया संचार होता है। इसी गहरे महत्व को और अधिक लोगों तक पहुँचाने के उद्देश्य से, केंद्र सरकार ने 30 दिसंबर 2021 को भारतीय झंडा संहिता, 2002 में एक महत्वपूर्ण संशोधन लागू किया।
📜 संशोधन की अहम बातें
पहले, राष्ट्रीय ध्वज बनाने के लिए केवल हाथ से काते और बुने गए खादी कपड़े का ही उपयोग मान्य था। यह नियम महात्मा गांधी द्वारा प्रेरित स्वदेशी आंदोलन की आत्मा से जुड़ा था। लेकिन समय की बदलती मांग और हर नागरिक तक तिरंगा पहुँचाने की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने कुछ अहम बदलाव किए—
- कपड़े की किस्मों में विस्तार – अब राष्ट्रीय ध्वज केवल खादी ही नहीं, बल्कि कपास, ऊन, रेशम और पॉलिएस्टर की बंटिंग से भी तैयार किया जा सकता है।
- निर्माण प्रक्रिया में बदलाव – पहले केवल हाथ से बने झंडों को मान्यता थी, जबकि अब मशीन से तैयार झंडे भी वैध माने जाएंगे।
🌟 बदलाव का प्रभाव
इन संशोधनों से तिरंगे का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा, जिससे यह दूर-दराज़ इलाकों तक भी आसानी से पहुँच सकेगा। यह न केवल “हर घर तिरंगा” जैसे अभियानों को बल देगा, बल्कि देश के हर नागरिक को अपने घर, दफ्तर या संस्थान में तिरंगा फहराने का अवसर प्रदान करेगा।
🇮🇳 निष्कर्ष
यह संशोधन केवल झंडा बनाने के नियमों में बदलाव नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय गर्व और एकता को हर कोने तक पहुँचाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। तिरंगा अब पहले से भी ज्यादा लोगों के जीवन का हिस्सा बन सकेगा—चाहे वह शहर की ऊँची इमारतें हों या गाँव के छोटे-छोटे आँगन।