
8 अगस्त 1956 — यूरोप के औद्योगिक युग का वह काला अध्याय, जिसने कोयले की धूल के बीच सैकड़ों सपनों को जला कर राख कर दिया। बेल्जियम के हेन्यू प्रांत के छोटे से शहर मार्सिनेल में स्थित बोइस दु काजिएर कोयला खदान उस दिन सुबह-सुबह अपने सामान्य कामकाज में व्यस्त थी। मजदूर धरती की गहराई में, अंधेरे सुरंगों में कोयला काट रहे थे। लेकिन कुछ ही मिनटों में वहाँ का सन्नाटा भय और चीखों में बदल गया।
🔥 मौत की सुरंग का आरंभ
एक यांत्रिक लिफ्ट प्रणाली में खराबी आई। धातु पर घर्षण से उठी छोटी-सी चिंगारी ने तुरंत ही पास रखे तेल और लकड़ी के हिस्सों को जला दिया।
खदान की संकरी सुरंगों में आग का फैलना बिजली की गति से हुआ, और जहरीली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस ने मजदूरों की सांसें छीननी शुरू कर दीं। कुछ ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन धुएं के घने बादल ने रास्ता ही निगल लिया।
👥 जिन्दगी के बदले मौत — 262 की बलि
उस दिन 262 मजदूर हमेशा के लिए अंधेरे में समा गए। इनमें 136 इटली से आए प्रवासी थे, जो बेहतर रोज़गार के सपनों के साथ बेल्जियम आए थे। बाकी मृतक बेल्जियम, पोलैंड, ग्रीस और अन्य यूरोपीय देशों से थे।
यह हादसा सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं था, बल्कि प्रवासी श्रमिकों के संघर्ष, उनकी बेबसी और औद्योगिक सुरक्षा की अनदेखी का कठोर प्रतीक बन गया।
⚖️ हादसे के बाद का असर
इस त्रासदी ने बेल्जियम और इटली के बीच गहरे कूटनीतिक तनाव को जन्म दिया।
इटली में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ, और अंततः मजदूरों के लिए सुरक्षा नियमों को कड़ा करने के लिए कई नए कानून लागू किए गए। मार्सिनेल की खदान आज भी एक स्मारक स्थल के रूप में खड़ी है, जो आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाती है कि मुनाफ़े से पहले इंसानी जान की कीमत है।
🕯️ यादें जो मिटती नहीं
मार्सिनेल आपदा का नाम सुनते ही आज भी कई परिवारों की आँखें नम हो जाती हैं। वह हादसा सिर्फ कोयले की गहराइयों में हुई आग नहीं था, बल्कि उन सपनों की चिता थी जो अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य लाने निकले थे।