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🇮🇳 भारतीय संस्कृति का नवजागरण: शिक्षा और परंपरा का अद्भुत मेल


भारत की सभ्यता और संस्कृति का इतिहास हजारों वर्षों की यात्रा का परिणाम है। यह एक विराट वटवृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें सनातन ज्ञान, धर्म और मान्यताओं में गहरी धंसी हुई हैं, और जिसकी शाखाएँ कला, साहित्य, विज्ञान, संगीत, दर्शन और चिकित्सा के रूप में दूर-दूर तक फैली हैं। एक समय ऐसा भी आया जब इस ज्ञान-सम्पदा की चमक धूमिल पड़ने लगी, परंतु आज भारत पुनः अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करने की दिशा में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है।

वर्तमान वैश्विक दौर में भारत केवल तकनीकी और आर्थिक प्रगति का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि वह अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए, परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम प्रस्तुत कर रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान अब सिर्फ धार्मिक या ऐतिहासिक संदर्भों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली में सार्थक स्थान मिल रहा है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, खगोलशास्त्र, गणित और दर्शन के विषयों को नए दृष्टिकोण से पढ़ाया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी न केवल इन्हें जाने बल्कि जीवन में अपनाए भी।

यह परिवर्तन केवल शैक्षणिक दायरे में नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक नवजागरण के रूप में उभर रहा है। योग और आयुर्वेद जैसी पारंपरिक विधाएँ अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान पा रही हैं। सांस्कृतिक महोत्सव, ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ जैसी योजनाएँ और स्थानीय कला-परंपराओं के संरक्षण के प्रयास, देश के कोने-कोने में छुपी सांस्कृतिक विविधताओं को उजागर कर रहे हैं।

इसके साथ ही, प्राचीन ग्रंथों और सांस्कृतिक दस्तावेजों को डिजिटलीकरण के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना, ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और उनका सौंदर्यीकरण, न केवल पर्यटन को प्रोत्साहित कर रहा है बल्कि लोगों में सांस्कृतिक गर्व की भावना भी जगा रहा है।

यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण हमें यह एहसास दिलाता है कि सशक्त राष्ट्र वही है, जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो और आधुनिक युग की चुनौतियों के साथ तालमेल बिठाए। भारत के इस नवजागरण में वह शक्ति निहित है जो उसे पुनः ‘विश्वगुरु’ के रूप में स्थापित कर सकती है—जहाँ ज्ञान, संस्कृति और नवाचार का प्रकाश पूरी दुनिया को आलोकित करेगा। यही परंपरा और प्रगति का संगम ‘नए भारत’ की सशक्त पहचान बनेगा।


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