
लखनऊ, 15 अगस्त 2025:
भारत की राजनीति में वैचारिक मतभेद कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन स्वतंत्रता दिवस 2025 पर एक बार फिर यह टकराव सुर्खियों में आ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सराहना करने के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखा पलटवार किया और संघ पर “स्वदेशी का मुखौटा पहनकर विदेशी सोच अपनाने” का आरोप लगाया।
अखिलेश यादव ने कहा कि संघ की नीतियाँ केवल दिखावे तक सीमित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की शुरुआत एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी दिशा में हुई थी, लेकिन वर्तमान में आरएसएस के प्रभाव में वह राह बदल चुकी है। अखिलेश के शब्दों में— “ये संगठन बाहर से स्वदेशी होने का दावा करता है, लेकिन अंदर से इनकी सोच पूरी तरह विदेशी है। देश को ऐसे दोहरेपन से सावधान रहना चाहिए।”
वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में आरएसएस के शताब्दी वर्ष को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए संगठन की प्रशंसा की। उन्होंने कहा— “एक सदी पहले जिस संगठन का जन्म हुआ, उसने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की दिशा में निरंतर काम किया है। राष्ट्रसेवा में समर्पण और अनुशासन का जो उदाहरण संघ ने प्रस्तुत किया है, वह दुनिया में किसी और संगठन से तुलना योग्य नहीं है।” उन्होंने आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन और सेवा भाव का प्रतीक बताया।
इस बयानबाजी के बाद सियासी हलकों में बहस तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी ने जहां इसे अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को मजबूत करने का अवसर माना, वहीं भाजपा और मोदी सरकार ने संघ के प्रति अपने गहरे जुड़ाव को सार्वजनिक रूप से दोहराया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर इस तरह की वैचारिक भिड़ंत भारत की राजनीति में बढ़ती ध्रुवीकरण की तस्वीर पेश करती है। सवाल यह भी है कि क्या देश की बड़ी पार्टियाँ विकास और जनता के मुद्दों पर एकजुट हो पाएंगी, या फिर वैचारिक मतभेद और आरोप-प्रत्यारोप ही राजनीति की दिशा तय करेंगे।
एक बात साफ है कि आरएसएस और समाजवादी पार्टी के बीच यह विवाद केवल तात्कालिक नहीं है, बल्कि भविष्य की राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।