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₹1 लाख करोड़ की रोजगार योजना: वादे बनाम जमीनी सच्चाई


🔍 भूमिका

प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (PMIS) को लेकर संसद में हाल ही में हुई चर्चा ने सरकारी रोजगार नीतियों की असलियत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि रोजगार के ऊँचे-ऊँचे दावे केवल आंकड़ों का खेल हैं, जबकि हकीकत में युवाओं को न पर्याप्त नौकरी मिल रही है और न ही गुणवत्तापूर्ण इंटर्नशिप।


📉 संसद में उजागर हुए तथ्य

लोकसभा में राहुल गांधी के प्रश्न पर कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उन्होंने स्थिति की गंभीरता को साफ कर दिया—

ये तथ्य ₹1 लाख करोड़ की रोजगार योजना की प्रगति को लेकर गंभीर संदेह पैदा करते हैं।


🎭 दोहराए गए वादे और “सीज़न 2” की राजनीति

राहुल गांधी ने व्यंग्य करते हुए कहा—

“₹1 लाख करोड़ की गूंज – सीज़न 2! 11 साल बाद भी वही पुरानी कहानी, वही आंकड़े। पिछले साल 1 करोड़ इंटर्नशिप का वादा, और इस साल फिर से वही रोजगार का शोर।”

उनका संकेत स्पष्ट था—सरकार की घोषणाओं में अमल से अधिक राजनीतिक प्रचार की गंध है।


👨‍🎓 युवा उम्मीदें बनाम हकीकत

भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है, लेकिन जब योजनाएं केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं, तो उनका भरोसा कमजोर होने लगता है।


🧭 सुधार की राह

युवाओं के सपनों को सच करने के लिए जरूरी है कि—

  1. इंटर्नशिप प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और समयबद्ध हो।
  2. स्टाइपेंड कम से कम न्यूनतम वेतन के बराबर तय किया जाए।
  3. निजी क्षेत्र के साथ मजबूत साझेदारी कर अवसरों का विस्तार किया जाए।
  4. हर वर्ष की प्रगति का स्वतंत्र और सार्वजनिक मूल्यांकन हो।

🗣️ निष्कर्ष

रोजगार योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब वे कागज़ से निकलकर युवाओं की ज़िंदगी में वास्तविक बदलाव लाएँ। ₹1 लाख करोड़ के दावे तब सार्थक होंगे, जब उनका असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे और युवाओं को भरोसा हो कि सरकार का वादा सिर्फ चुनावी नारा नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई है।


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