
अलास्का शिखर सम्मेलन के बाद दुनिया की निगाहें अब यूरोपीय देशों और उनके सहयोगी साझेदारों पर टिकी हुई हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात के तुरंत बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया कि यूरोप, अमेरिका और यूक्रेन एक साझा रणनीति पर एकजुट हैं।
🤝 मैक्रों की बैठक और साझा संकल्प
मैक्रों ने एक समन्वय बैठक में राष्ट्रपति ट्रंप, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की और यूरोपीय साझेदारों के साथ मिलकर यह तय किया कि:
- यूक्रेन को लगातार समर्थन देना अनिवार्य है।
- रूस पर दबाव बनाए रखना होगा, जब तक कि वह अपनी आक्रामक कार्रवाइयों को रोककर एक स्थायी और न्यायपूर्ण शांति स्थापित न करे।
- किसी भी शांति समझौते को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कड़े सुरक्षा आश्वासनों के साथ लागू किया जाना चाहिए।
🔐 सुरक्षा गारंटी और अमेरिका की भूमिका
मैक्रों ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि बिना मजबूत सुरक्षा गारंटी के शांति टिकाऊ नहीं हो सकती। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की तत्परता का स्वागत किया और कहा कि “हम इस दिशा में अमेरिका और ‘Coalition of the Willing’ के अन्य साझेदारों के साथ मिलकर आगे बढ़ेंगे।”
📜 इतिहास से सबक
मैक्रों ने यह भी चेताया कि पिछले 30 वर्षों का अनुभव बताता है कि रूस अक्सर अपने वादों और समझौतों का पालन नहीं करता। इसलिए इस बार केवल कागज़ी समझौते नहीं, बल्कि सख़्त और ठोस सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है।
🇫🇷 फ्रांस का स्पष्ट रुख
राष्ट्रपति मैक्रों ने अपने बयान का अंत यह कहकर किया कि फ्रांस हमेशा यूक्रेन के साथ खड़ा रहेगा। उनका संदेश केवल रूस को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को यह बताता है कि यूरोप यूक्रेन की संप्रभुता और अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।
✨ निष्कर्ष
अलास्का मुलाक़ात के बाद स्पष्ट है कि पश्चिमी देश यूक्रेन मुद्दे पर किसी भी तरह की ढिलाई बरतने को तैयार नहीं हैं। यूरोप और अमेरिका का यह संयुक्त रुख रूस पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ यूक्रेन को दीर्घकालिक सुरक्षा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।