
नई दिल्ली, 20 अगस्त 2025 – दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने 2020 के दंगे से जुड़े एक मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि पुलिस की जांच लापरवाही और कई विरोधाभासों से भरी हुई है, जिससे अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा।
यह मामला उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दयालपुर थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। एफआईआर की शुरुआत एक बाइक शोरूम में आगजनी की घटना से हुई थी। लेकिन अदालत ने पाया कि चार्जशीट में इस अहम घटना का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया और न ही इसकी कोई जांच की गई। इस विसंगति पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) परवीन सिंह ने अकील अहमद उर्फ पापड़, रहीश खान और इरशाद को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा—
“अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा है कि आरोपियों की संलिप्तता संदेह से परे है। इसलिए, सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाता है और वे सभी आरोपों से मुक्त किए जाते हैं।”
न्यायाधीश सिंह ने यह भी कहा कि चार्जशीट और जांच अधिकारियों (IOs) ने हीरो होंडा शोरूम में आगजनी की घटना को लेकर पूरी तरह चुप्पी साधी। उन्होंने टिप्पणी की—
“जबकि यही घटना इस एफआईआर का प्रारंभिक बिंदु थी और बाद की घटनाओं को भी इसमें जोड़ा गया, लेकिन इसकी जांच क्यों नहीं हुई, इसका कोई उत्तर उपलब्ध नहीं है।”
अदालत का यह निर्णय उन मामलों पर भी सवाल खड़ा करता है, जिनमें दंगे और आगजनी से जुड़े आरोप लगाए गए थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक अभियोजन ठोस सबूतों के साथ आरोप सिद्ध न करे, तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इस मामले में अधिवक्ता सिकंदर ने आरोपी अकील की ओर से पैरवी की। यह मामला नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए दंगों से जुड़ा था।
👉 यह फैसला न सिर्फ आरोपियों के लिए राहत लेकर आया है बल्कि पुलिस की जांच पद्धति और कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। अदालत ने साफ कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए निष्पक्ष और गहन जांच अनिवार्य है, अन्यथा निर्दोष लोग झूठे मामलों में फंस सकते हैं।