
नई दिल्ली: अंतरिक्ष में जाने की कल्पना जितनी रोमांचक है, उतनी ही जटिल भी है। जब कोई रॉकेट धरती से उड़ान भरता है तो अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि भारी-भरकम यान आखिर गुरुत्वाकर्षण को कैसे मात देता है और आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच जाता है? इसका उत्तर विज्ञान के सिद्धांतों और आधुनिक तकनीक में छिपा है।
रॉकेट की उड़ान का विज्ञान
रॉकेट उड़ने का मुख्य आधार न्यूटन का तीसरा गति नियम है – “हर क्रिया के बदले बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।”
रॉकेट का इंजन जब विशेष ईंधन को जलाता है, तो उससे अत्यधिक गरम और तेज़ गति वाली गैसें उत्पन्न होती हैं। ये गैसें रॉकेट के निचले हिस्से से बाहर निकलती हैं। गैसों का यह बाहर निकलना एक “क्रिया” है, जिसके परिणामस्वरूप रॉकेट को विपरीत दिशा यानी ऊपर की ओर “प्रतिक्रिया बल” मिलता है। यही सिद्धांत रॉकेट को अंतरिक्ष की ओर धकेलता है।
रॉकेट को चरणों में उड़ाने की तकनीक
- पहला चरण (लॉन्च) : उड़ान की शुरुआत में रॉकेट अधिकतम ईंधन और शक्ति का इस्तेमाल करता है ताकि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल सके।
- दूसरा चरण (ऊँचाई हासिल करना) : पहले हिस्से के अलग होने के बाद हल्का रॉकेट कम ईंधन के साथ अधिक ऊँचाई पर पहुँचता है।
- अंतिम चरण (अंतरिक्ष यात्रा) : आख़िरी भाग में वैज्ञानिक उपकरण, उपग्रह या अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से कक्षा में पहुँचते हैं।
ईंधन और शक्ति का महत्व
रॉकेट में इस्तेमाल होने वाला ईंधन साधारण नहीं होता। यह विशेष रूप से इस तरह तैयार किया जाता है कि जलने पर बहुत अधिक ऊर्जा और दबाव पैदा करे। यही ऊर्जा रॉकेट को वायुमंडल चीरते हुए ऊपर ले जाती है।
निष्कर्ष
रॉकेट उड़ान किसी जादू का नतीजा नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित और इंजीनियरिंग के समन्वय का परिणाम है। न्यूटन के नियम, शक्तिशाली इंजन और उन्नत तकनीक के मेल से ही रॉकेट धरती की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष की ओर बढ़ पाता है।