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🚜 किसानों पर सख्ती, पूंजीपतियों पर नरमी: दोहरे मापदंड की सच्चाई


भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक तंत्र में एक गहरा विरोधाभास लंबे समय से देखा जा रहा है। एक ओर छोटे किसान और आम नागरिक मामूली ऋण की चूक पर भी कठोर कार्रवाई झेलते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े उद्योगपति अरबों रुपये के बकायेदार होकर भी विशेष छूट और संरक्षण का लाभ उठाते हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक न्याय पर सवाल उठाती है बल्कि लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों को भी चुनौती देती है।


🌾 किसानों की त्रासदी: कर्ज़ और कठिनाइयाँ

भारतीय किसान प्राकृतिक आपदाओं और बाज़ार की अनिश्चितताओं के बीच खेती करता है।

इन परिस्थितियों में किसान अक्सर बैंकों या साहूकारों से कर्ज़ लेता है। लेकिन जब समय पर भुगतान संभव नहीं होता, तो नोटिस, ज़मीन की नीलामी, संपत्ति की कुर्की और कई बार गिरफ्तारी तक का सामना करना पड़ता है। दुख की बात यह है कि दबाव और निराशा के चलते अनेक किसान आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं।


🏭 उद्योगपति: सुरक्षा कवच और राजनीतिक सहारा

इसके विपरीत, अनेक बड़े उद्योगपति बैंकों से भारी-भरकम ऋण लेकर विदेश चले जाते हैं।

आम जनता के टैक्स से चलने वाले बैंकों का पैसा ऐसे घोटालों में फँसा रहता है, लेकिन एक किसान को अपने कुछ हज़ार रुपये के कर्ज़ के लिए भी जीवनभर कीमत चुकानी पड़ती है।


📊 समाज और अर्थव्यवस्था पर असर

इस दोहरे व्यवहार का सीधा नुकसान पूरे देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन को होता है।


⚖️ मुख्य सवाल: समानता कहाँ है?

क्या यह न्याय है कि गरीब किसान की ज़मीन कुर्क कर ली जाए, लेकिन अरबपति आराम से विदेश में रहकर कानून से बच निकले?
क्या लोकतंत्र का यही स्वरूप है कि ताकतवर के लिए नरमी और कमजोर पर सख्ती हो?


🔎 निष्कर्ष

भारत में सच्चा आर्थिक न्याय तभी स्थापित हो सकता है जब—

यदि अरबपतियों पर भी वैसी ही कठोर कार्रवाई हो जैसी किसानों पर होती है, तो न केवल देश की वित्तीय व्यवस्था मज़बूत होगी, बल्कि समाज में विश्वास और समानता की भावना भी गहरी होगी।


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