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दहेज हत्या: आधुनिक भारत की सभ्यता पर अमिट धब्बा


ग्रेटर नोएडा में हाल ही में घटित दहेज हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भले ही भारत विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है, लेकिन समाज का एक हिस्सा आज भी अंधविश्वास, लोभ और अमानवीय परंपराओं की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाया है।

एक नवविवाहिता की मौत केवल इस कारण हो जाना कि उसके मायके वाले दहेज की अतिरिक्त मांग पूरी नहीं कर सके—यह न केवल कानून और नैतिकता की हार है, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। दहेज प्रथा सदियों पुरानी सामाजिक कुरीति है, जिसे खत्म करने के लिए अनेक कानूनी प्रावधान बने, अभियानों ने गति पकड़ी और समाज सुधारकों ने जागरूकता फैलाई। इसके बावजूद, आए दिन दहेज हत्या जैसी दर्दनाक घटनाएँ सामने आना हमारे सामाजिक ढांचे की गहरी खामियों को उजागर करता है।

कानून और उसकी सीमाएँ

भारत में दहेज निषेध अधिनियम (1961) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी और 498-ए जैसे कड़े कानून मौजूद हैं, जिनमें दोषियों को कठोर सजा का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई यह है कि कानून के बावजूद सामाजिक मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो पाया। जब तक समाज स्वयं दहेज प्रथा को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक केवल कानूनी डर से इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं।

समाज की भूमिका

दहेज हत्या केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की असफलता है। जब तक लोग शादी को ‘लेन-देन’ का सौदा समझते रहेंगे, तब तक न जाने कितनी बेटियाँ इसी तरह अपनी जान गंवाती रहेंगी। जरूरत है कि परिवार, शैक्षणिक संस्थान और मीडिया मिलकर युवाओं को यह संदेश दें कि विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है, न कि आर्थिक लेन-देन का साधन।

समाधान की राह

निष्कर्ष

दहेज हत्या जैसी घटनाएँ केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं हैं, बल्कि यह हमारी सभ्यता और संवेदनशीलता पर गहरा प्रश्नचिह्न हैं। यदि वास्तव में भारत को प्रगति और आधुनिकता की राह पर आगे बढ़ाना है, तो समाज को इस कुरीति से मुक्त करना ही होगा। दहेज रहित विवाह ही हमारे भविष्य की सच्ची पहचान और वास्तविक प्रगति का आधार बन सकते हैं।


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