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इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने 18 अफगान नागरिकों के निर्वासन पर लगाई रोक


इस्लामाबाद, 26 अगस्त 2025
पाकिस्तान की इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम अंतरिम आदेश जारी करते हुए 18 अफगान नागरिकों को जबरन देश से निकाले जाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम सुनवाई तक इन शरणार्थियों को पाकिस्तान छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

निर्वासन आदेश पर न्यायिक हस्तक्षेप

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने बताया कि याचिकाकर्ताओं के प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन (PoR) कार्ड की वैधता समाप्त हो चुकी थी, जिसके आधार पर प्रशासन ने उन्हें “गैरकानूनी विदेशी” मानकर निर्वासन की कार्रवाई शुरू की थी। प्रभावित व्यक्तियों की ओर से दायर याचिकाओं पर विचार करते हुए मुख्य न्यायाधीश सरफ़राज़ डोगर ने यह अंतरिम राहत प्रदान की। साथ ही, अदालत ने पाकिस्तान के गृह मंत्रालय, संघीय जांच एजेंसी और इमिग्रेशन विभाग को विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा है।

राजनीतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि

ख़बरों के अनुसार, जिन अफगान नागरिकों की याचिका पर यह आदेश आया है, उनका संबंध पाकिस्तान के एक पूर्व राजनेता फ़ज़लुर रहमान के परिवार से है। रहमान ने वर्ष 2008 में पाकिस्तानी नागरिकता के लिए आवेदन किया था, जो अब तक लंबित है। इस वजह से अदालत का हस्तक्षेप और भी अहम माना जा रहा है।

पाकिस्तान की वापसी योजना पर सवाल

गौरतलब है कि पाकिस्तान सरकार ने हाल ही में “ग़ैरकानूनी विदेशियों की वापसी योजना” लागू करने की घोषणा की थी। इसके तहत जिन अफगान शरणार्थियों के PoR कार्ड 30 जून 2025 तक नवीनीकृत नहीं हुए, उन्हें 31 अगस्त तक स्वयं पाकिस्तान छोड़ने का निर्देश दिया गया है। 1 सितंबर से जबरन निकासी की कार्रवाई प्रस्तावित है।

इस नीति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस को जन्म दिया है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) और मानवाधिकार संगठन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ज़बरदस्ती निर्वासन “नॉन-रिफाउलमेंट” सिद्धांत का उल्लंघन है। इस सिद्धांत के तहत किसी शरणार्थी को ऐसे देश वापस नहीं भेजा जा सकता, जहाँ उसकी जान, सुरक्षा या स्वतंत्रता को खतरा हो।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तान में लंबे समय से बसे लाखों अफगान शरणार्थियों का जीवन अचानक संकट में पड़ सकता है। इनमें से अनेक परिवार पीढ़ियों से पाकिस्तान में रह रहे हैं, उनके बच्चे यहीं पढ़-लिख रहे हैं और समाज में समाहित हो चुके हैं। ऐसे हालात में जबरन निकासी एक गंभीर मानवीय संकट खड़ा कर सकती है।

निष्कर्ष

इस्लामाबाद हाई कोर्ट का आदेश न सिर्फ़ प्रभावित 18 अफगान नागरिकों के लिए राहत है, बल्कि यह पूरे मामले को संवेदनशील दृष्टिकोण से देखने का संकेत भी देता है। यह फैसला याद दिलाता है कि शरणार्थियों और विस्थापित लोगों से जुड़े मुद्दों में मानवाधिकार और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखना आवश्यक है। आने वाले दिनों में अदालत की विस्तृत सुनवाई और सरकार की प्रतिक्रिया तय करेगी कि पाकिस्तान इस चुनौतीपूर्ण स्थिति को किस प्रकार संभालता है।


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