
लेखक: लकी
दुनिया के राजनीतिक मंच पर जब दो प्रभावशाली शक्तियाँ आमने-सामने होती हैं, तब केवल सैनिक ताकत नहीं, बल्कि शब्दों और विचारों की भी अहम भूमिका होती है। हाल ही में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक ट्वीट में रूस की नीतियों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा:
“यूरोपीय संघ किसी की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करता, न ही धमकाने की नीति अपनाता है—रूस के विपरीत।”
यह टिप्पणी जितनी सीधी प्रतीत होती है, उतनी ही गहरी रणनीतिक सोच से प्रेरित है। यह संदेश केवल फ्रांस की राय नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ की एक स्पष्ट कूटनीतिक दिशा को दर्शाता है।
🕰️ पृष्ठभूमि: क्यों उठा यह मुद्दा?
रूस और यूरोपीय संघ के बीच वर्षों से तनाव बना हुआ है—चाहे वह यूक्रेन संघर्ष हो, नॉर्ड स्ट्रीम जैसी ऊर्जा परियोजनाएँ, साइबर हमले हों या फिर डिजिटल दुष्प्रचार। क्रेमलिन द्वारा बार-बार यह आरोप लगाया जाता है कि पश्चिमी देश रूस की छवि को बिगाड़ने के लिए “सूचना युद्ध” का सहारा लेते हैं। इसी के जवाब में मैक्रों ने एक वीडियो में कहा:
“La propagande du Kremlin nous explique”
(यानी “क्रेमलिन का प्रचार हमें समझाने की कोशिश करता है”)—इसका सीधा संकेत है कि फ्रांस अब सिर्फ रक्षात्मक नहीं, बल्कि जवाबी रुख भी अपना रहा है।
🌍 यूरोपीय संघ: अब केवल शांतिदूत नहीं
पारंपरिक रूप से यूरोपीय संघ को शांति, मानवाधिकार और लोकतंत्र का पोषक माना जाता रहा है। परंतु बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों ने इसे एक निर्णायक ताकत बनने पर विवश कर दिया है। फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड जैसे राष्ट्र अब केवल विचार नहीं, ठोस रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं—चाहे वह रक्षा क्षेत्र में सहयोग हो, ऊर्जा आपूर्ति की स्वतंत्रता हो या साइबर हमलों से सुरक्षा।
🧠 डिजिटल दौर का नया युद्धक्षेत्र: सूचना
आज के युग में युद्ध केवल बंदूक और टैंक से नहीं, बल्कि ट्वीट, वीडियो और नैरेटिव से लड़ा जाता है। मैक्रों का सोशल मीडिया पर दिया गया बयान एक “डिजिटल कूटनीति” का हिस्सा है, जहां शब्द एक रणनीतिक हथियार बन चुके हैं।
रूस और पश्चिम के बीच चल रही यह ‘नैरेटिव वॉर’ दर्शाती है कि मीडिया, तकनीक और जनमत अब अंतरराष्ट्रीय नीतियों के सबसे बड़े मोहरे बन गए हैं।
🇮🇳 भारत की स्थिति: संतुलन की कूटनीति
भारत हमेशा से रूस और यूरोपीय संघ दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध रखता आया है। रूस भारत का रक्षा सहयोगी रहा है, तो वहीं यूरोपीय संघ भारत का एक बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक भागीदार है। ऐसे में भारत को अत्यंत संतुलित नीति अपनानी होती है—जहां वह वैश्विक तनावों से दूरी रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
भारत के लिए यह समय है बहुपक्षीयता को और अधिक मज़बूती देने का, न कि पक्ष लेने का।
🔚 निष्कर्ष: शब्दों से बनती रणनीतियाँ
इमैनुएल मैक्रों का बयान इस ओर इशारा करता है कि विश्व राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां शब्द केवल बयान नहीं—रणनीतिक दिशा होते हैं।
यूरोपीय संघ अब एक ऐसा संगठन बनता जा रहा है जो शांति और लोकतंत्र की रक्षा के साथ-साथ अपनी सुरक्षा और प्रभावशीलता को लेकर भी गंभीर है। और इस परिवर्तन में सोशल मीडिया, सूचना और सार्वजनिक विमर्श सबसे बड़े औजार बन चुके हैं।