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बंगाल का लोकतांत्रिक नवाचार: ‘दुआरे सरकार’ और ‘हमारा समाधान’ की ऐतिहासिक पहल


लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जब शासन सीधे नागरिकों की चौखट तक पहुँचे। पश्चिम बंगाल ने हाल के वर्षों में इस विचार को व्यवहारिक रूप देकर एक अद्वितीय उदाहरण पेश किया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पहल पर शुरू किए गए ‘दुआरे सरकार’ और ‘हमारा समाधान’ अभियान ने शासन और जनता के बीच की दूरी को पाटते हुए नई प्रशासनिक संस्कृति को जन्म दिया है।

26 दिनों में करोड़ों लोगों तक पहुँच

सिर्फ 26 दिनों की अवधि में इन शिविरों के माध्यम से एक करोड़ से अधिक लोगों को लाभ पहुँचा। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि यदि नीयत और नीति सही हो तो प्रशासनिक व्यवस्था जनता के जीवन में ठोस परिवर्तन ला सकती है।

दुआरे सरकार: सेवाएँ बिना दफ्तर के चक्कर

‘दुआरे सरकार’ यानी “सरकार आपके दरवाज़े पर”—इस योजना का मूल उद्देश्य यही था कि नागरिकों को किसी कार्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें। गाँवों से लेकर कस्बों और शहरी इलाकों तक लगे शिविरों ने स्वास्थ्य योजनाओं, छात्रवृत्ति, पेंशन, राशन कार्ड, रोजगार अवसरों और अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को आम लोगों की पहुँच में ला दिया।

हमारा समाधान: समस्याओं का तत्काल हल

इसके समानांतर चलाया गया ‘हमारा समाधान’ अभियान नागरिकों की शिकायतों के निपटारे का सीधा मंच बना। अधिकारी सीधे जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएँ सुनते और मौके पर ही समाधान निकालते। इससे प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

लोकतंत्र का असली रूप

इन पहलों से यह स्पष्ट हो गया कि लोकतंत्र केवल नीतियों और कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता की रोज़मर्रा की ज़रूरतों और समस्याओं का समाधान करने का ज़रिया भी है। जब नागरिकों को लगे कि सरकार उनकी पहुंच में है, तभी लोकतंत्र की असली ताक़त सामने आती है।

निष्कर्ष

‘दुआरे सरकार’ और ‘हमारा समाधान’ अब महज योजनाएँ नहीं, बल्कि जन-भागीदारी और सुशासन का सशक्त मॉडल बन चुके हैं। पश्चिम बंगाल ने यह साबित कर दिया है कि यदि शासन लोगों के बीच जाकर काम करे, तो प्रशासन जनता की सेवा का असली पर्याय बन सकता है। यह अनुभव न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


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