
आज के दौर में जब पूरी दुनिया विज्ञान, तकनीक और विकास की नई ऊँचाइयों को छू रही है, उसी समय इंसानियत का सबसे दर्दनाक चेहरा भी हमारे सामने है। हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने जिस अमानवीय कृत्य की ओर इशारा किया है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि “ज़ायोनी शासन के प्रमुख आज जिस तरह बच्चों को भूख और प्यास से मार रहे हैं, वैसा अपराध इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।”
बच्चों पर सबसे बड़ा अत्याचार
बच्चे मासूम होते हैं। उनका न कोई राजनीतिक एजेंडा होता है और न ही किसी तरह की साज़िश। फिर भी, युद्ध और राजनीतिक टकराव का सबसे गहरा असर उन्हीं पर पड़ता है। भोजन और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित करना न केवल एक अपराध है, बल्कि यह मानवता के अस्तित्व पर सीधा प्रहार है। भूख और प्यास से तड़पते मासूम चेहरों की तस्वीरें पूरी दुनिया के ज़मीर को झकझोर रही हैं।
इतिहास में ऐसी क्रूरता दुर्लभ
इतिहास ने कई युद्ध और नरसंहार देखे हैं, लेकिन निर्दोष बच्चों को योजनाबद्ध तरीके से भूख और प्यास से मरने के लिए मजबूर करना शायद सबसे घिनौना और क्रूर अपराध है। यह न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि इंसानियत के मूल्यों का भी अंत है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी
दुनिया भर के राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन इस समय बड़ी परीक्षा में हैं। क्या वे केवल बयानबाज़ी करेंगे, या फिर सचमुच कदम उठाकर मासूम बच्चों की जान बचाएँगे? बच्चों को भोजन, पानी और दवाइयों से वंचित रखना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र और अन्य शक्तिशाली देशों को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए ताकि निर्दोष जीवन बचाए जा सकें।
मानवीय दृष्टिकोण
धर्म, राजनीति और सीमाओं से परे, सबसे पहले इंसानियत आती है। किसी भी बच्चे की भूख से बिलखती आँखें केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की हार को दर्शाती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि दुनिया मिलकर ऐसी त्रासदियों को रोके और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी मासूम की जान भूख या प्यास से न जाए।
👉 निष्कर्ष यह है कि बच्चों को भूख और प्यास से मरने पर मजबूर करना न केवल युद्ध अपराध है बल्कि मानवता के खिलाफ़ सबसे बड़ा पाप है। यह समय है कि दुनिया केवल देखे नहीं, बल्कि आवाज़ उठाए और कदम बढ़ाए।