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किसानों की दशा : भारतीय कृषि की वास्तविक तस्वीर


भारत को सदियों से कृषि प्रधान देश कहा जाता है। यहाँ की संस्कृति, परंपरा और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर आधारित है। किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जा, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण जीवन की धुरी भी हैं। इसके बावजूद, आधुनिक भारत में किसानों की दशा कई दृष्टियों से चिंताजनक बनी हुई है।

1. आर्थिक असमानता और आय की समस्या

छोटे और सीमांत किसान खेती से न्यूनतम आय ही अर्जित कर पाते हैं। बढ़ती लागत, उर्वरक और बीजों के दाम, डीज़ल-पेट्रोल का खर्च तथा मंडियों में उचित मूल्य न मिलने से किसान अपनी मेहनत का पूरा प्रतिफल नहीं ले पाते। खेती का लाभकारी व्यवसाय न रह पाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है।

2. जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संकट

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का अनुमान लगाना कठिन हो गया है। कभी बेमौसम बारिश, तो कभी लंबा सूखा या ओलावृष्टि – ये सब सीधे किसान की फसल पर असर डालते हैं। पर्याप्त सिंचाई साधनों और आधुनिक तकनीक तक पहुँच न होने से किसान असुरक्षित रहते हैं।

3. सामाजिक दबाव और मानसिक बोझ

किसान का जीवन केवल खेत तक सीमित नहीं है। घर की ज़िम्मेदारियाँ, बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक आवश्यकताएँ उसे कर्ज़ लेने पर मजबूर कर देती हैं। जब नुकसान होता है, तो यही कर्ज़ मानसिक तनाव और अवसाद का कारण बन जाता है। यही वजह है कि ग्रामीण भारत में किसान आत्महत्या की घटनाएँ बार-बार सामने आती हैं।

4. नीतियाँ और वास्तविकता

हालाँकि सरकार समय-समय पर योजनाएँ लागू करती रही है, जैसे – न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, ऋण माफी आदि। लेकिन इन योजनाओं का लाभ अधिकांशतः चुनिंदा किसानों तक ही सीमित रह जाता है। जमीनी स्तर पर पारदर्शिता और सुचारु क्रियान्वयन की कमी किसानों की दशा सुधारने में बड़ी बाधा है।

5. सुधार और संभावनाएँ

किसानों की दशा सुधारने के लिए केवल योजनाएँ ही नहीं, बल्कि ठोस कदमों की ज़रूरत है।


निष्कर्ष

किसानों की दशा केवल कृषि का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश के विकास से जुड़ा प्रश्न है। यदि किसान मज़बूत होगा, तो देश की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि स्वतः सुदृढ़ होगी। इसलिए अब समय है कि किसानों को केवल “अन्नदाता” कहने भर तक सीमित न रहकर उन्हें सम्मान, उचित मूल्य और तकनीकी सहयोग भी दिया जाए।


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