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भाजपा की आंतरिक कलह और छात्रों पर असर


भारतीय राजनीति में सत्ता संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह संघर्ष जनता और छात्रों की सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल ही में घटित घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा की आंतरिक खींचतान केवल नेताओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर आम जनता और खासकर छात्रों पर भी पड़ रहा है।

भाजपा के भीतर गुटबाज़ी और वर्चस्व की लड़ाई अब इतनी गहरी हो चुकी है कि यह सड़कों और संस्थानों में हिंसा के रूप में दिखाई देने लगी है। कभी “मुख्य” नेताओं पर हमला होता है, तो कभी “उप” नेता आकर पीड़ितों की खबर लेते हैं। यह विरोधाभासी स्थिति छात्रों और आम जनता को असमंजस में डाल रही है। लोग सवाल करने लगे हैं कि क्या यह आपसी मिलीभगत है या सचमुच सत्ता संघर्ष?

छात्रों में असंतोष स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वे कह रहे हैं कि वे दो पाटों – “काउंसिल” और “ब्रिगेड” – के बीच पिस रहे हैं। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी ताकत साबित करने के लिए एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं, लेकिन इसकी कीमत निर्दोष छात्रों को चुकानी पड़ रही है।

इस घटना ने भाजपा की “अपनों” वाली छवि पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब छात्र और युवा कह रहे हैं कि भाजपा किसी की अपनी नहीं है, बल्कि केवल सत्ता और स्वार्थ की राजनीति करती है। सोशल मीडिया और आम जनमानस में यह चर्चा तेज़ हो रही है कि अगर सत्ता में बैठे लोग ही एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा कर रहे हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

इस बीच घायल छात्रों और युवाओं के परिवार न्याय और मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। विपक्ष ने मांग की है कि पीड़ितों का उचित इलाज कराया जाए और प्रत्येक घायल को मुआवज़े के रूप में 1-1 लाख रुपये की सहायता राशि दी जाए।

यह प्रकरण सिर्फ एक राजनीतिक दल की आंतरिक कलह का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि जब राजनीति में संवाद और सहिष्णुता खत्म हो जाती है, तो उसका सबसे बड़ा शिकार आम जनता और छात्र बनते हैं। यदि सत्ता पक्ष वास्तव में जनता के प्रति जिम्मेदार है, तो उसे हिंसा और संघर्ष की राजनीति छोड़कर पारदर्शिता और जवाबदेही की राह अपनानी होगी।


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