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किसान-हितैषी शासन : भरोसा, सुरक्षा और नई संभावनाएँ


भारतीय ग्रामीण जीवन का केंद्र कृषि है। यह केवल खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की संस्कृति, परंपराओं और अर्थव्यवस्था का भी आधार है। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान देश के भोजन का संरक्षक है, परंतु जब अचानक आई बाढ़, सूखा या अनियमित वर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ उसे घेर लेती हैं, तो उसका संघर्ष कई गुना बढ़ जाता है।

ऐसे समय में सरकार की भूमिका केवल राहत पहुँचाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसकी जिम्मेदारी होती है किसानों का विश्वास जीतना और भविष्य के लिए ठोस समाधान तैयार करना। हाल के वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने अनेक किसान-हितैषी कदम उठाए हैं—फसल बीमा योजनाओं से लेकर आपदा राहत पैकेज तक। इन प्रयासों से किसानों को यह भरोसा मिला है कि संकट की घड़ी में वे अकेले नहीं हैं।

कृषि को सशक्त बनाने के लिए तकनीक और आधुनिक साधनों का समावेश भी अनिवार्य है। बेहतर सिंचाई व्यवस्था, जल संरक्षण, उन्नत बीज और वैज्ञानिक खेती पद्धतियाँ भविष्य की दिशा तय करती हैं। जब शासन किसानों के साथ खड़ा होता है, तब केवल उनकी आजीविका ही नहीं बचती, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिलती है।

किसान-समर्थक नीतियाँ दरअसल देश के समग्र विकास की आधारशिला हैं। जब खेतों में समृद्धि होती है, तभी शहरों में भी आर्थिक प्रवाह बना रहता है। यही कारण है कि किसान-हितैषी शासन न केवल राहत और जिम्मेदारी का प्रतीक है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और उज्जवल भविष्य की गारंटी भी है।


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