
धरती पर जीवन का आधार उसकी उपजाऊ मिट्टी और पर्याप्त जल है। लेकिन जब यही उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे अपनी क्षमता खोकर रेत और बंजर में बदलने लगती है, तो इसे रेगिस्तान फैलाव कहा जाता है। यह सिर्फ भूगोल की समस्या नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य के लिए एक गंभीर संकट है।
रेगिस्तान फैलाव क्या है?
रेगिस्तान फैलाव (Desertification) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें हरियाली से भरपूर भूमि लगातार खराब होकर खेती योग्य न रह जाए। यह स्वाभाविक रूप से नहीं होता, बल्कि इंसानी गतिविधियाँ और बदलती जलवायु इस समस्या को और तेज़ करती हैं।
मुख्य कारण
- जलवायु परिवर्तन – बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा मिट्टी की नमी और उपजाऊपन छीन लेते हैं।
- वनों की कटाई – जंगलों के खत्म होने से मिट्टी खुली रह जाती है और हवा या पानी के बहाव से उड़कर बंजर में बदल जाती है।
- अत्यधिक सिंचाई व रसायनिक खेती – भूमि की प्राकृतिक संरचना बिगड़ जाती है और लंबे समय में वह अनुपयोगी हो जाती है।
- पशुओं की अनियंत्रित चराई – घास और झाड़ियाँ खत्म हो जाने से जमीन उजाड़ हो जाती है।
- पानी का अंधाधुंध दोहन – भूजल स्तर गिरने से क्षेत्र सूखने लगता है और जीवन धीरे-धीरे खत्म होता है।
इसके दुष्परिणाम
- खेती योग्य भूमि में भारी कमी
- खाद्य संकट और किसानों की आय में गिरावट
- पानी की समस्या और सूखे की स्थिति
- गाँवों से शहरों की ओर पलायन
- वन्य जीव-जंतुओं और जैव विविधता का विनाश
रोकथाम के उपाय
- बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और हरे आवरण का संरक्षण।
- जल संरक्षण तकनीकें जैसे वर्षा जल संचयन और छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण।
- सतत कृषि पद्धति अपनाना – जैविक खाद, फसल चक्र और प्राकृतिक खेती।
- चराई पर नियंत्रण तथा चारागाह भूमि का विकास।
- स्थानीय लोगों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता।
निष्कर्ष
रेगिस्तान फैलाव धीरे-धीरे फैलने वाला ऐसा संकट है, जो समय रहते न रोका गया तो मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। धरती की उपजाऊ शक्ति को बचाना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। छोटे-छोटे प्रयास, जैसे पेड़ लगाना, पानी बचाना और टिकाऊ खेती अपनाना, मिलकर इस समस्या को बड़ी हद तक कम कर सकते हैं।