
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल ही में एक मार्मिक और गहन संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने हमास द्वारा लंबे समय से बंधक बनाए गए लोगों के प्रति अपनी गहरी चिंता और समर्थन व्यक्त किया। अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर उन्होंने लिखा – “700 दिन। 700 दिन अपने परिवार से दूर। 700 दिन कैद की अमानवीय परिस्थितियों में।”
यह संदेश सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और न्याय की पुकार है। मैक्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “मैं हमास की हिरासत में अब भी फंसे सभी बंधकों की तुरंत रिहाई की मांग करता हूं। क्रूरता और पीड़ा की यह स्थिति बहुत लंबी खिंच चुकी है।”
“700 दिन” – प्रतीक्षा और पीड़ा का प्रतीक
राष्ट्रपति का यह ट्वीट बंधकों और उनके परिवारों की स्थिति को दुनिया के सामने उजागर करता है। “700 दिन” केवल समय की गिनती नहीं है, बल्कि उन परिवारों की अंतहीन प्रतीक्षा, चिंता और टूटे हुए सपनों का प्रतीक है। हर दिन उनके लिए नई बेचैनी और हर रात एक और कठिन परीक्षा बन जाती है।
फ्रांस की मानवीय परंपरा का निर्वाह
फ्रांस ऐतिहासिक रूप से मानवाधिकारों और मानवीय संकटों पर मुखर रहा है। मैक्रों ने हमास की कार्रवाई को “बर्बरता” कहकर यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसी अमानवीय घटनाओं को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका यह बयान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक मजबूत संदेश देता है कि बंधकों की तुरंत और बिना शर्त रिहाई आवश्यक है।
वैश्विक एकजुटता की पुकार
मैक्रों का यह ट्वीट केवल इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि युद्ध और हिंसा का सबसे बड़ा खामियाज़ा हमेशा निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ता है। यही कारण है कि शांति, न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और एकजुटता बेहद ज़रूरी है।
निष्कर्ष
मैक्रों का संदेश केवल बंधकों की रिहाई का आह्वान नहीं, बल्कि मानवता के प्रति एक गहरी संवेदना और आशा की किरण है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि संघर्ष चाहे कहीं भी हो, उसका असर सीमाओं से परे जाकर पूरी दुनिया पर पड़ता है। यह ट्वीट दरअसल पीड़ा के अंत और मानवीय मूल्यों की विजय की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।